22 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
पहले प्रकार का सबूत है भारत तथा श्रीलंका से रोम को भेजे गये राजदूतों की संख्या।
पहला राजदूत श्रीलंका से आया। इसका उल्लेख प्लिनी ने किया है। इसकी निश्चित तिथि निर्धारित करना असंभव है, किंतु परिस्थिति के साक्ष्य के आधार पर कहा जा सकता है कि यह घटना 41 और 54 ई.पू. के बीच हुई। यह राजदूत क्लौडिस भेजा गया था जो वहाँ उस समय पहुँचा जब रोम के इतिहासकार एग्रीप्पिना के षड्यंत्रों और मैसालीना की मृत्यु जैसी गम्भीर घटनाओं में इतने व्यस्त थे कि वे इसका पर्याप्त उल्लेख नहीं कर सके। यह राजदूत श्रीलंका के राजा चंद्र मुक सिवा द्वारा भेजा गया था जिसने 44 से 52 ई. तक शासन किया। ख्1, इसके बाद और राजदूत भेजे गये। दूसरा राजदूत 107 ई. में ट्रोजन पहुँचा, तीसरा 138 ई. में एंटोनियस पिपस, चौथा 361 ई. में जुलियन, तथा पाँचवा 530 ई. में जैस्टिनिया पहुँचा। भारतवासियों ने इन राजदूतों का कोई जिक्र नहीं किया है। रोम के इतिहासकारों ने इनका उल्लेख किया है, लेकिन बहुत ही संक्षिप्त ब्यौरा दिया है। इसलिए इन राजदूतों के उद्देश्यों के विषय में कुछ कहना कठिन है। तथापि इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत और रोम के बीच निरंतर सक्रिय सम्बन्ध बने रहे और सर्वियस तथा उसके पुत्र कोमोडस के शासनकाल में जब अलेक्जेंड्रिया तथा पालमिरा दोनों वाणिज्य में व्यस्त थे और खुशहाल थे, रोम के भारत के साथ सम्बन्ध सर्वोच्च शिखर पर थे। उस समय रोम के साहित्य में भारत के मामलों की ओर अधिक ध्यान दिया गया और पहले की भाँति इसे सिकंदर के इतिहासकारों के उदाहरणों अथवा सेलेयूसीडियन राजदूतों के विवरणों तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसमें दूसरे स्वतंत्र स्रोतों से भी जानकारी एकत्र की गयी। ख्2,
साहित्यिक प्रवृति के दूसरे सबूत भी इसी निष्कर्ष को बल देते हैं। डॉ. हीर्थ ने अपने फ्चायना एंड द रोमन ओरियंटय् में सुंग शू, जो कि एक चीनी इतिहासकार था और जिसने 420-478 ई. के बारे में इतिहास का उद्धरण देते हुए कहा है कि जहाँ तक टाटसिन (सीरिया) और ईनचू (भारत) का प्रश्न है, जो पश्चिमी समुद्र में बहुत दूर स्थित है, हमें यह कहना है कि ‘‘यद्यपि दोनों ‘हन’ राजवंशों के राजदूतों को इस मार्ग में विशेष कठिनाइयाँ हुईं फिर भी माल का लेन-देन होता रहा तथा माल विदेशी कबीलों को भेजा जाता रहा और हवा के वेग से समुद्र के रास्ते माल बहुत दूर तक पहुँचता रहा। वहाँ की ऊँची पर्वतमालाएँ हमें ज्ञात पर्वतमालाओं से भिन्न हैं तथा अनेक प्रकार के कबीले जिनके नाम हैं और असाधारण पद नाम हैं हमसे पूर्णतः भिन्न प्रकार के हैं। भूमि तथा समुद्र के बहुमूल्य उत्पाद उनके यहाँ हैं, गेंडों के सींगों से बने आभूषण और
देखिए जे.आर.एस. खंड-28, पृष्ठ 349-350
देखिए जे.आर.ए.एस. खंड-19, पृष्ठ 276
देखिए जे.आर.ए.एस. खंड-19, पृष्ठ 307