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पुखराज, सर्प, मणि और एसवेस्टास के कपड़े, असंख्य प्रकार की आश्चर्यजनक वस्तुएँ और साथ ही संसार के स्वामी (बुद्ध) की उपासना में मन लगाने की शिक्षा इन सभी बातों के कारण इन भागों में जहाजरानी और व्यापार का विस्तार हुआ है।य्
एक और चीनी इतिहासकार मतोआनलिन ने प्राचीन काल सम्बन्धी अपने शोधों में कहा है कि फ्भारत (500-516 ई.) का समुद्र के रास्ते समुचित मात्रा में टास्टिन, रोम साम्राज्य तथा आन्सी या एसी के साथ काफी व्यापार होता था। ख्3, एक कुशाग्र बुद्धि लेखक ने कहा है कि पालमिरा के नष्ट होने के पश्चात् भारत तथा रोम के मध्य कभी सीधा व्यापार नहीं हुआ। उनका कहना है कि रोमवासियों ने अपना व्यापार केन्द्र इथोपिया के मुख्य बंदरगाह अदुले में स्थापित किया और यद्यपि कान्सेंटाइन के समय वहाँ आर्थिक सम्पन्नता थी फिर भी रोम का व्यापार अदुले से आगे बाहर कभी नहीं बढ़ा।
परन्तु पुरातत्व सम्बन्धी अन्वेषणों तथा ऐतिहासिक संदर्भों से दूसरे ही निष्कर्ष निकलते हैं। श्री विन्सैंट स्मिथ के अनुसार फ्यह मानने के प्रबल कारण हैं कि व्यापार में लगे रोम के लोगों के काफी बड़े उपनिवेश हमारे युग की पहली दो शताब्दियों में दक्षिण भारत में बसाये गये और यूरोप के सिपाही जिन्हें बलवान यवन कहा जाता था, और हथियारों से लैस गूँगे म्लेच्छ (बर्बर) जामाल राजाओं के अंगरक्षक के रूप में काम करते थे, जबकि यवनों के पानी के जहाज मिर्च लेने के लिए मुजरीस (क्रंगलोर) जाते थे जिसके लिए उन्हें रोमन स्वर्ण में भुगतान होता था। ख्1, यहाँ केवल रोम के व्यापारियों की ही बस्तियाँ नहीं थीं बल्कि रोम के सिपाही मांडचा तथा अन्य तमिल के राजाओं की सेवा करते थे। ख्2, और पांडया-आरयप्पादायी-कडरेथा-नेदुन्ज- चैलियान के शासनकाल में रोम के सिपाहियों को मदुरै के किले की रक्षा करने के लिए रखा जाता था। ख्3, मुद्रा सम्बन्धी सबूत भी यह साबित करते हैं कि रोम और भारत के बीच घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध थे। (पांडुलिपि का आधा पृष्ठ खाली छोड़ा गया है- सं. पादक)।
रोम और भारत के बीच इन व्यापारिक सम्बन्धों का कारण यह है कि फ्मार्क एंटोनी के समय से लेकर जुस्टीनियन के समय तक अर्थात् (30 ई.पू. से 550 ई. तक) पार्शियों और ससानियनों के विरुद्ध संधिबद्ध राष्ट्रों के रूप में उनका राजनीतिक महत्त्व और पूर्व तथा पश्चिम के बीच एवं मुख्य मार्ग के नियन्त्रक के रूप में उनके वाणिज्यिक महत्त्व ने कुशों और शकों की मैत्री को जिनका सिंधु घाटी और बैक्ट्रिया पर कब्जा था, रोम के लिए बहुत महत्त्व का विषय बना दिया। ख्4,
अरली हिस्ट्री ऑफ इंडिया, पृष्ठ 400-401
मुखर्जी के ‘इंडियन शिपिंग’ में पृष्ठ 128 में उद्धृत
वही, पृष्ठ 128 में उद्धृत
वही, पृष्ठ 139 में उद्धृत