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नावों से मुचीरी के किनारे लाया जाता है जहाँ समुद्र की लहरों की आवाज कभी बंद नहीं होती और जहाँ केरल के राजा कुडडुवन (चेरा राजा) आगन्तुकों को समुद्र तथा पहाड़ों की अद्भुत वस्तुएँ भेंट करते हैं। ख्2, कवि रीपड्डीनम या पुकार का विवरण भी उतना ही महत्त्वपूर्ण तथा प्रेरणादायक है। इसे कावेरी नदी के उत्तरी तट पर बनाया गया था। तब एक चौड़ी और गहरी नदी आती है जिसमें भारी लदे जहाज अपनी गति धीमी किये बिना प्रवेश कर आते हैं। इस नगर को दो भागों में विभाजित किया गया था। एक भाग मारूवर पक्कम, समुद्र तट से सटा था। मारूवर पक्कम में समुद्र तट के पास प्लेटफॉर्म, गोदाम और माल गोदाम बनाये गये थे जहाँ जहाजों से उतारी गयी खाद्य सामग्री रखी जाती थी। यहाँ सीमा शुल्क के भुगतान के पश्चात् माल पर चोल राजा के शेर के चिह्न वाली मुहर लगाई जाती थी और माल, व्यापारियों के गोदामों में भेज दिया जाता था। पास ही विदेशी यवन व्यापारियों की बस्तियाँ थीं जहाँ अनेकों वस्तुएँ सदैव बिक्री के लिए रखी जाती थीं। यहाँ यवन (विदेशी) व्यापारियों के प्रधान कार्यालय भी थे जो समुद्र पार से आये थे और विभिन्न भाषाएँ बोलते थे। माराबार-पत्कम में खुशबूदार पेस्ट और पाउडर, फूल तथा इत्र के विक्रेता दर्जी जो रेशम, ऊन व सूती कपड़ों की सिलाई करने वाले दर्जी थे, चन्दन, मीना, मोती, सोना तथा कीमती पत्थर के व्यापारी, अनाज के व्यापारी, मछली, चारा विके्रता, कसाई, लोहार, बढ़ई, ठठेरे, चित्रकार, सुनार, मोची व खिलौना बनाने वाले भी रहते थे। ख्1’’,
भारत और पश्चिम के बीच व्यापार मार्गों को दो शीर्षकों में बाँटा जा सकता है अर्थात् (1) भू मार्ग और (2) समुद्री मार्ग।
यह सच ही कहा गया है कि व्यक्तिगत तौर पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना सभ्य लोगों की आदत है। प्राचीन लोग प्रबल सामाजिक प्रवृत्ति के कारण अथवा सुरक्षा के अभाव के कारण सदैव समूहों में आवागमन करते थे। यह आदत उनके व्यापार की शैलियों में अच्छी तरह प्रदर्शित होती है। चूँकि वे फेरी लगाते थे उनको इस बात का डर नहीं था कि प्रतिस्पर्धा के कारण उनकी बिक्री कम हो जाएगी। पहले व्यापारी प्रतिकूल परिस्थितियों में अपने लदे हुए पशुओं के साथ कारवाँ में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते थे, परन्तु आज के आरामपरस्त व्यक्ति, उसे व्यापार का शौक कितना ही क्यों न हो, ऐसी कठिनाइयाँ सहने के बजाय धन संपत्ति प्राप्त करने का इरादा छोड़ देगा। व्यापारियों के समूह के बारे में हरबर का कहना हैµ फ्व्यापारी स्वेच्छा से किसी मार्ग पर नहीं जाते थे, अपितु यह एक प्रथा बन गयी थी। उन्हें जिन रेतीले रेगिस्तानों में से होकर जाना पड़ता था, प्रकृति ने उनमें व्यापारियों के लिए कहीं-कहीं विश्राम स्थल भी बना दिए थे जहाँ खजूर के वृक्षों की छाया और ठंडे झरनों के पास व्यापारी
आर.के. मुखर्जी, ‘इंडियन शिपिंग’, पृष्ठ 135-136
कलकत्ता रिव्यू, खंड 19, पृष्ठ 345 में उद्धृत