अध्याय-2 : मध्ययुग में भारत के व्यापारिक सम्बन्ध अथवा इस्लाम का उदय और पश्चिमी यूरोप का विस्तार - Page 42

अध्याय 2

मध्य युग में भारत के व्यापारिक सम्बन्ध

अथवा

इस्लाम का उदय और पश्चिमी यूरोप का विस्तार

जिस समय रोम में ग्रेगोरी महान के अधीन पोप की सत्ता का प्रभाव बढ़ा, उसी समय इस्लाम का उदय हुआ। यह राज्यों का युग था और पूर्व से एक बार फिर धर्म प्रचार की लहर फैली जो सम्पूर्ण यूरोप महाद्वीप को मुसलमान बनाने में प्रायः सफल हुई अफ्रीका, एशिया और अनेक बड़ी चीजों की तो बात ही छोडि़ए इसका उदय छोटी जगह से हुआ।

मुहम्मद के जन्म से बहुत पहले अरब में विभिन्न कबीले रहते थे और वे पूर्व तथा पश्चिम के बीच व्यापार का माध्यम होने के कारण काफी संपन्न थे। अरब के लोगों की इस खुशहाली का प्रमाण पेटा से डमास्कस के बीच नष्ट हो गये शहरों के खंडहरों से मिलता है। किंतु स्ट्रावों के अनुसार अरब लोगों की सम्पन्नता का यह स्रोत शीघ्र समाप्त हो गया जब रोम के लोगों ने भारत से सीधा व्यापार करना आरम्भ कर दिया। भारत तथा अरब का माल लाल सागर के पश्चिमी तट पर माओस हीरमोस में पहुँचता था और वहाँ से ऊँटों से थैब्स पहुँचता था फिर उसके बाद वहाँ से समुद्र द्वारा अलेक्जेंड्रिया जाता था। इसके परिणामस्वरूप अरब फ्रेगिस्तान के सच्चे सपूतय् बन गये थे।

आर्थिक दृष्टि से अरब की तरह कोई अन्य देश निर्धन नहीं हैं। गिब्बन के अनुसार अरब रेतीला, पथरीला तथा खुशहाल देश है। कृषि भूमि व पानी की कमी के कारण अरब के लोग एक स्थान पर नहीं बस सके। वे घुमंतू तथा कबीली बने रहे और धर्म तथा राजनीति के मामले में एक नहीं हो सके। एकता न होने के कारण अरब लोगों को विदेशी आक्रमणकारियों ने कई बार रौंद डाला। एबीसीनियन्स परसिपन्स, मिस्र के सुलतान तथा तुर्कों ने बारी-बारी यमन राज्य को अपने अधीन किया। निर्दयी सीथियन्स ने मक्का व मदीना के पवित्र स्थानों की निष्ठा की माँग की और अरब आंशिक रूप से रोम साम्राज्य का प्रांत बन गया। परंतु कोई भी स्थाई तौर पर अरब को दबा न सका