अध्याय-2 : मध्ययुग में भारत के व्यापारिक सम्बन्ध अथवा इस्लाम का उदय और पश्चिमी यूरोप का विस्तार - Page 43

28 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

और उन्होंने सैसोस्ट्रिस, साइरस, पोम्बे और ट्रोजन जैसे शक्तिशाली राजाओं का शासन पलट दिया। अरबों में स्वतन्त्रता की इस भावना के कारण उनके भौगोलिक आवास में देखने को मिलते हैं।

अरब लोगों के धार्मिक अनुष्ठान आडम्बरहीन तथा कलाविहीन होने के कारण इसमें शामिल पुरा विद्या अथवा उच्च दार्शनिक चिंतन का कोई स्थान नहीं था। अरब के लोगों तथा भारतीयों के धर्म में सूर्य की पूजा, चंद्रमा की पूजा तथा अचल सितारे थे। ख्1, प्रत्येक कबीला, प्रत्येक परिवार व प्रत्येक स्वतन्त्र योद्धा अपनी काल्पनिक पूजा के पात्र तथा अनुष्ठानों का चयन अपने ढंग से करता था तथा उनमें परिवर्तन करता था, किंतु राष्ट्र ने प्रत्येक युग में मक्का की भाषा व धर्म के आगे अपना सिर झुकाया। ख्2, गैर-मुसलमानों के धर्म में परिवर्तन का काम कोई कठिन नहीं था, क्योंकि वे गैर-ईसाई अरबी उत्तर में और दक्षिण में नजरान में ईसाइयों के साथ शान्तिपूर्वक रह रहे थे। यहूदी समुदाय उत्तर पूर्व में रहते थे और पारसी फारस की खाड़ी के पास शान्तिपूर्वक रहते थे। इस समीपता के परिणामस्वरूप विचारों का आदान-प्रदान होने से मुहम्मद के जन्म से बहुत पहले अरब के लोग एक ही ईश्वर में विश्वास करने लग गये और हनीफ इसका प्रतीक है।

हनीफी आंदोलन से प्रभावित होकर अथवा अन्यथा मुहम्मद ने जो ऊँट चालक था, पतित अरब लोगों की जो आपस में लड़ते रहते थे और काबा में अनेकों देवी मूर्तियों के समक्ष मनुष्यों की बलि दिया करते थे, दशा सुधारने की योजना बनाई। किसी व्यक्ति ने इतने कम साधन होने पर पैगम्बर होने का दावा नहीं किया, किंतु उसने हिम्मत तथा विश्वास के साथ इस्लाम के नाम से जिस धर्म का अपने परिवार तथा राष्ट्र में प्रचार किया, वह एक शाश्वत सत्य है। और यह सत्य इस प्रकार है कि ईश्वर केवल एक है और मुहम्मद ईश्वर का पैगम्बर है। मुहम्मद के जन्म के समय के हालात उनके पैगम्बर होने की घोषणा के अनुकूल प्रतीत होते हैं। ख्3, यह याद किया जाएगा कि अरब में बहुत से कबीले रह रहे थे और सभी समान रूप से स्वतन्त्र थे। तथापि ये सभी कबीले के कुरेशी कबीले सम्मान में एक हो गये जिसने गलत अथवा सही तरीकों से काबा के स्मारक पर अधिकार जमा लिया और काबा में पुरोहिताई का काम हाशमी के परिवार विशेष रूप से मुहम्मद के दादा को मिला। अरब के लोगों में अपनी उच्च स्थिति का लाभ उठा कर मुहम्मद ने एकेश्वरवाद के सिद्धान्त का प्रचार करना आरम्भ कर दिया। मुहम्मद के सिद्धान्त में कुछ भी नया नहीं है जो वास्तव में पैगम्बर का अपना हो। उनका कुरान यहूदी धर्म तथा ईसाई धर्म के बीच का मध्य भाग

  1. गिब्बन, ‘डिक्लाइन एंड फाल ऑफ दी रोमन एम्पायर’ खंड 5, पृष्ठ 327

  2. वही µ पृष्ठ 327-328

  3. वही µ पृष्ठ 337