अध्याय-2 : मध्ययुग में भारत के व्यापारिक सम्बन्ध अथवा इस्लाम का उदय और पश्चिमी यूरोप का विस्तार - Page 44

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है। उनके उपदेशों का जो भी महत्त्व हो, अरब के लोगों ने उनको बैर की भावना से देखा। यहाँ तक कि हाशमी अपने ही लोगों की दृष्टि में गिर गया। मुहम्मद के मिशनरी जोश से अरब के लोगों का लचीलापन बढ़ा, जैसा कि आजकल मिशनरी प्रचार के कारण हिन्दुओं का हठीलापन बढ़ गया है। अधीन होकर अरब के लोगों ने मुहम्मद को बाहर निकालने के लिए हाशमियों को बाहर किया, जिसके जीवन को ही खतरा हो गया था। मुहम्मद ने अपना ध्यान मदीना पर केन्द्रित किया किन्तु उन्हें यहाँ निश्चय नहीं था कि उनको वहाँ स्वागत मिलेगा। अतः उन्होंने मक्का में अपने शिष्यों के माध्यम से मदीना के लोगों से बातचीत की। उनकी कृपा के सम्बन्ध में आश्वस्त हो जाने पर वह मदीना में रहने लगे और अपने नये तथा प्रिय धर्म को नष्ट होने से बचा लिया, जो निश्चित तौर पर अपनी आरम्भिक अवस्था में ही नष्ट हो गया होता, यदि मदीना ने विश्वास तथा आदर के साथ मक्का से निष्कासित लोगों को अपने गले न लगाया होता। ख्1, अतः मदीना में ठहरना मुहम्मद के लिए काफी लाभप्रद था। उनको पुरोहिती के साथ-साथ राजोचित तथा न्यायिक के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकार मिल गये। वह एक धर्मदूत के साथ-साथ एक राजा भी बन गये और उन्हें धार्मिक तथा प्रशासनिक शक्ति प्राप्त हो गयी। स्वाधीन लोगों की पसंद ने मक्का से भाग कर आये व्यक्ति को एक शासक बना दिया और उसे सन्धि करने के विशेषाधिकार दिये गये। मानवीय अधिकारों की कमी पूरी की गयी प्रथा पर्याप्त ईश्वरीय शक्ति प्रदान की गयी। मदीना के पैगम्बर ने अपने नये उद्घाटनों में भीषण और खूंखार स्वर में विश्वास दिलाया जिससे स्पष्ट हो जाता है उनका पूर्ववर्ती आत्मसंयम कमजोरी के कारण था। अनुनय के तरीके अपनाए गये, सहनशीलता का समय समाप्त हो गया और अब उन्हें तलवार के बल पर अपने धर्म का प्रचार करने, मूर्तिपूजा के स्थान नष्ट करने और दिनों या महीनों की पवित्रता का विचार किये बिना पृथ्वी के विश्वास वाले राष्ट्रों को राजी करने का हुक्म हुआ था। ख्1, इस प्रकार एक स्थान मिल जाने पर उन्होंने अपने पंथ और राज्य का विस्तार आरम्भ कर दिया। अरबी, चूँकि व्यापारी और डाकू दोनों ही थे, इसलिए मुहम्मद के शिष्य मदीना होकर जाने वाले कुरैश के व्यापारियों को परेशान करने लगे। इससे उत्तेजित होकर कुरैशियों ने मदीना के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। कुछ समय तक तो मुहम्मद अपना बचाव करता रहा किन्तु थोड़े समय पश्चात् उसने आक्रामक कार्यवाही आरम्भ कर दी और अपने जन्म-स्थान पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार उसने अपनी फौजी शक्ति व साधन दोनों को बढ़ा लिया। मुहम्मद के शत्रुओं के समक्ष मैत्री, समर्पण अथवा युद्ध के विकल्प रखे गये। यदि वे इस्लाम धर्म अपना लेते थे तो उन्हें आरंभिक शिष्यों की भाँति सभी सांस्कृतिक

  1. गिब्बन, ‘डिक्लाइन एंड फाल ऑफ दी रोमन एम्पायर’ खंड 5, पृष्ठ 356

  2. गिब्बन, ‘डिक्लाइन एंड फाल ऑफ दी रोमन एम्पायर’ खंड 5, पृष्ठ 359