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आर्थिक दृष्टि से इसका विश्लेषण करें तो भी इसी बात की पुष्टि होती है। एक प्रसिद्ध लेखक का कहना है कि फ्अरबों का एकदम उमड़ पड़ना स्पष्ट रूप से अकस्मात् था। पिछली कई शताब्दियों से अरब के लोग दूसरे स्थानों पर बसने की तैयारी कर रहे थे। यह अंतिम बड़ा सेमी देशान्तर था जो अरब के आर्थिक पतन से सम्बन्धित था। संक्षेप में मुहम्मद से बहुत पहले अरब अशान्ति की स्थिति में था तथा अरब के कबीले धीमी गति से लेकिन अनियोजित रूप से निकटवर्ती पारसी तथा रोमन राज्य क्षेत्रों में घुसपैठ कर रहे थे जहाँ उनकी मुलाकात वहाँ अरब से पहले गये सेमी लोगों अर्थात आरमेनिया के आदिवासियों से हुई जो वहाँ की जलवायु के बहुत पहले से अभ्यस्त हो गये थे।
अरब तथा धनलोलुपता, न कि धर्म ऐसी शक्तियाँ हैं जो आदमी को प्रेरित करती हैं लेकिन धर्म से आदमी को आवश्यक शक्ति मिलती है और वह उसे आवश्यक एकता प्रदान करती है। अरबों के धर्म का प्रसार, समय तथा अन्तर्वस्तु की दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है, लेकिन इसे एक राजनैतिक अनिवार्यता माना जा सकता है। इस्लाम द्वारा इसे पार्टी नारा तथा संगठन दिये जाने से काफी पहले ही यह आन्दोलन चल रहा था।य् ख्1,
नए धर्म के प्रचार और तत्कालीन आर्थिक शक्तियों से प्रेरित होकर मुहम्मद के मक्का से पलायन के पश्चात् 46 वर्षों के भीतर मुसलमान बने नये-नये लोग हथियारों से लैस होकर किस्तुनतुनिया के पास पहुँचे और उसका घेराव कर लिया। (668-765 ई.) यह घेरा बिना किसी निर्णायक परिणाम के 7 वर्षों तक चला। घेरा डालने वालों ने किस्तुनतुनिया की शक्ति तथा संसाधनों का सही अनुमान नहीं लगाया। अपने धर्म तथा साम्राज्य को खतरे में पाकर रोमनों में भी जोश आ गया और उन्होंने अरब आक्रमणकारियों का अनुशासन में रहते हुए बड़ी संख्या में मुकाबला किया और इतनी वीरता दिखाई कि पूर्व और पश्चिम में उनके नागरिकों में नये जीवन का संचार हुआ और अरबी विजय प्राप्त नहीं कर सके। यदि वे किस्तुनतुनिया जीतने में सफल हो जाते तो ईसाइयों के भविष्य पर निश्चित रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता। अरब के लोगों ने किस्तुनतुनिया पर दूसरी बार आक्रमण किया और उसका घेरा डाल दिया। (716-718 ई.) लेकिन इस बार भी वही परिणाम रहे।
इन सभी विजयों के दौरान सेल्जुक मुसलमानों ने अरब लोगों की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण कर दी। उनके उत्थान के समय बगदाद के अबबासिद खलीफा क्वैन को, पहले बूईद के शिया वंश ने और तत्पश्चात् अधिक शक्तिशाली फातिमी प्रतिद्वंद्वियों ने नीचा दिखाया। इन परिस्थितियों के कारण खलीफा ने सेल्जुक तुर्कों के उत्थान का स्वागत् किया, जिनसे रूढि़वादी इस्लाम के समर्थक होने के कारण उसकी पूरी खोई सत्ता और
- कैंब्रिज मिडिवल हिस्ट्री, खंड 2, पृष्ठ 331-332