36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
ने एशिया में वरूसा से यूरोप में एडरियानोपनल अपनी राजधानी ले गया। सेल्जुक तुर्क हलेसपांट पहुँचे, लेकिन इसे पार करने का निर्णय ओटोमन पर छोड़ दिया। किस्तुनतुनिया कई तुर्की राजाओं का स्वप्न रहा था। जब से ओटोमन ने यह स्वप्न देखा कि किस्तुनतुनिया उसके कब्जे में आ गया है, उन्होंने इस शानदार नगर पर कब्जा करने का मन बना लिया। कुलिश बयेजिद ने इसका घेरा डाल दिया। मूसा ने इस पर काफी दबाव डाला। मुराद-दो, ने बड़े धैर्य से इसको जीतने की योजना बनाई। केवल एक नगर को ही जीतना था क्योंकि उस प्रांत का बाकी क्षेत्र ओटोमन ने बहुत पहले ही जीत लिया था, लेकिन इस राजधानी नगर के धन, सौंदर्य, शक्ति और स्थिति ने तुर्कों को इतना प्रभावित किया कि इसे जीतना ही तुर्कों की महत्त्वाकांक्षा बन गया। ख्1, महमूद दो, अर्थात् छठा ओटोमन सम्राट बड़ी उत्सुकता से इस बात की प्रतीक्षा कर रहा था कि इस नगर को कैसे जीता जाये। सम्राट की शत्रुता का लाभ उठाते हुए उसने नगर पर आक्रमण करने की तैयारी की और 29 मई, 1453 को जीत लिया। अचम्भे की बात नगर का पतन नहीं है बल्कि लम्बे समय तक उसका डटे रहना है। क्योंकि इस समय बाइजैन्टाइन साम्राज्य की हालत इतनी कमजोर हो गयी थी कि वह मुकाबला करने की स्थिति में नहीं था। निःसन्देह इतनी लम्बी अवधि तक तुर्कों का मुकाबला करते रहने का कारण इसके रक्षकों का योग्य होना नहीं है बल्कि हमलावरों के पास पर्याप्त साधन उपलब्ध न होना है। ख्2, सम्भवतया विश्व में सामरिक दृष्टि से इतना अनुकूल स्थान कोई नहीं है जितना कि किस्तुनतुनिया है। इसका एशिया, यूरोप और अफ्रीका तीनों महाद्वीपों से सम्पर्क है और जिसका भी इस पर कब्जा रहा, उसने इन तीनों महाद्वीपों पर प्रभुत्व रखा। किस्तुनतुनिया के भौतिक बल और आक्रमणों का सामना करने की शक्ति के बारे में डॉ. कनिघगम का कहना हैµ फ्हर नयी शताब्दी में नये-नये आक्रमणकारियों ने आक्रमण किया। चौथी शताब्दी में इसकी स्थापना तुरन्त बाद गार्थो ने इस पर आक्रमण किया। पाँचवीं शताब्दी में हूणों और चंडालों ने तथा छठी में सलावों ने आक्रमण किये। इसके बाद सातवीं शताब्दी में अरबों और पारसियों ने तथा आठवीं और नवीं शताब्दी में मग्यारों, बुलगारों तथा रूसियों ने आक्रमण किये। वीनस और चौथे धर्मयुद्ध की सफलता से इसकी प्रतिष्ठा खत्म हो जाने और लातीनी राज्य की स्थापना होने के बाद भी पुनः स्थापित राज्य तुर्कों का लम्बी अवधि तक मुकाबला कर सका। यह कई बार डगमगाया, लेकिन इसने 1453 तक साहस नहीं छोड़ा, जबकि यह बुरी तरह परास्त हो गया। ख्3,
यह बड़े सौभाग्य की बात है कि यह शाही नगर इन अनवरत आक्रमणों को सहन कर सका और पुरातन सभ्यता के खंडहरों को सुरक्षित रख सका। ईसाई मत के प्रचार के लिए भी यह सौभाग्य की बात थी कि इस्लाम मत यूरोप में ईसाई मत के एक वास्तविक शक्ति
वही, पृष्ठ 107-108
विश्वकोश ब्रिटानिका, खंड 27, पृष्ठ 443
डब्ल्यू कनिघम, वैस्टर्न सिविलाइजेशन-एन्शियेन्ट टाइम्स, पृष्ठ 197-98