अध्याय-2 : मध्ययुग में भारत के व्यापारिक सम्बन्ध अथवा इस्लाम का उदय और पश्चिमी यूरोप का विस्तार - Page 52

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बनने से काफी पहले रुक गया। इसने बर्बरता को सहन करते हुए पुरातन सभ्यता को विकसित होने का अवसर दिया। कुस्तुनतुनिया ने जो काम पूर्व दिशा में किया वही काम बहुत पहले तूर पश्चिमी दिशा में कर चुके थे, शायद इतने वैभवशाली ढंग से नहीं। तुर्क लोगों से बहुत पहले अरब के लोग किस्तुनतुनिया को पाने की अपनी चेष्टाओं में निराश होने पर इसे पाने में सफल हुए और दक्षिण की ओर फैल गये, और उन्होंने अफ्रीका होते हुए अपने धर्म का प्रचार करते हुए जिब्राल्टर से होकर पश्चिमी दिशा में यूरोप में प्रवेश करने का इरादा जताया। जहाँ इनके थोड़ा आगे बढ़ने पर पश्चिम जगत ने उनका छिट-पुट विरोध किया। गोथ उनके प्रभावशाली आक्रमण से मुश्किल से अपनी रक्षा कर सके। 711 ई. तक स्पेन अरबों और बाबेरों के नियन्त्रण में आ गया और मूर के अप्रवासी वहाँ पर बड़ी संख्या में आ गये। अपनी जीत से उत्साहित होकर अरबों ने गौल को पार करने का विचार किया लेकिन ड्यूक ऑफ एक्यीलेन ने उनको रोक लिया। तथापि ड्यूक, 732 में बोरडीओक्स के पास हार गया। वे दुगुनी शक्ति से पोर्टअर्स तक बढ़े और टुर्स के लिए कूच किया। लेकिन यहाँ एक अधिक शक्तिशाली दुश्मन से उनकी टक्कर हुई। चार्ल्स के अधीन फ्रेंक्स हैमर (मोरटैल) ने टुर्स में अरबों को हराया और स्थाई तौर पर उनका आगे बढ़ना रोक दिया। अरबों ने फिर कभी भी पाइयोनीज को पार करने की चेष्टा नहीं की। यदि अरबों ने यूरोप को अपने कब्जे में ले लिया होता तो यूरोपीय सभ्यता का क्या होता, यह अनुमान लगाना कठिन है। यह निश्चित है कि फ्राँसीसी के मुकाबले मूर अधिक प्रभावशाली थे। प्रो. रोबिन्सन का कहना है कि फ्इतिहासकार साधारण तौर पर इसे अच्छे भाग्य का मामला मानते हैं कि चार्ल्स, हैमर तथा इसके बर्बर सिपाही मुसलमानों को टुर्स में हराने तथा उन्हें पीछे भगाने में सफल हुए। लेकिन यदि उनको दक्षिण फ्राँस में बसने दिया होता, तो उन्होंने विज्ञान तथा कला को फ्राँसीसियों की अपेक्षा अधिक तेजी से विकसित किया होता।’’ ख्1,

जब एशिया के खानाबदोश लोगों की इन तेज गतिविधियों के कारण मध्य एशिया के सभी शान्तिपूर्ण कार्यकलापों में बाधा आ रही थी, रोम साम्राज्य का तेजी से पतन हो रहा था और यूरोप में दुबारा सन्नाटा छा गया जो जर्मनी के लोगों द्वारा अनवरत रूप से युद्ध की स्थिति बनाये रखने पर ही समाप्त हुआ।

इन हालात में व्यापार कम होना अवश्यंभावी था। पूरे मध्य कालीन व्यापार के सामने कई बाधाएँ थीं। पूरे पश्चिमी यूरोप में पैसे की कमी के कारण विनिमय में काफी बाधाएँ आती थीं। ईसाई धर्म मात्र एक आशावादी धर्म था जो जीवन की सुख-सुविधाओं का प्रतिवाद करता था और आर्थिक गतिविधियों पर धर्म का नियन्त्रण हो गया था। उचित मूल्य का सिद्धान्त लागू होने पर तथा थोक व्यापार पर रोक लगने से व्यापार बहुत कम हो गया।

  1. ब्रेसली और राबिन्स µ फ्आउटलाइन्स ऑफ यूरोपियन हिस्ट्रीय् भाग-1 (न्यूयार्क) 1914, पृष्ठ 368
  2. ब्रेसली और राबिन्स µ फ्आउटलाइन्स ऑफ यूरोपियन हिस्ट्रीय् भाग-1 (न्यूयार्क) 1914, पृष्ठ 506