अध्याय-2 : मध्ययुग में भारत के व्यापारिक सम्बन्ध अथवा इस्लाम का उदय और पश्चिमी यूरोप का विस्तार - Page 56

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चर्च का दोहरा उद्देश्य था जो बर्नार्ड के शब्दों से भली-भाँति स्पष्ट है। दूसरे धर्मयुद्ध के योद्धाओं का आदर करते हुए उन्होंने कहा है, फ्उन अनगिनत लोगों में पापी-अपवित्र, देवद्रोही मनुष्य, घातक और झूठी गवाही देने वालों को छोड़ कर तुम्हें ऐसे बहुत कम लोग मिलेंगे जिनके जाने से दोहरा लाभ होता है। यूरोप उनके जाने से खुश होता है और फिलिस्तीन उनको पाने से खुश होता है। इस प्रकार उनका यहाँ से जाना और वहाँ पहुँचना दोनों लाभदायक हैं। ख्1,

असन्तुष्ट तथा अधीर सामन्त जो जिम्मेवारी से बचना चाहते थे और अपराधी तथा पापी लोगों और श्रद्धालुओं तथा भावुक लोगों के धर्म युद्धों और उनके उद्देश्यों के बारे में उनके अपने-अपने विचार थे। लेकिन व्यापारिक गणतन्त्रों के चतुर व्यापारी और नाविक धर्मयोद्धाओं की ओर इस दृष्टि से नहीं देखते थे जिस दृष्टि से उन्हें सामान्य कैथोलिक सामन्त और देशीय जिलों के मजदूर देखते थे। उनमें भी धार्मिक उत्साह था, लेकिन उन्होंने इसका एक भावना के रूप में विकास न करके एक उपयोगी वस्तु के रूप में विकास किया। और उन्हें इस्लाम के प्रति बहुत कम घृणा महसूस हुई तथा धार्मिक स्थलों के प्रति उनकी श्रद्धा अधिक तीव्र नहीं रही। इससे फिलिस्तीन भेजे गये योद्धाओं और तीर्थयात्रियों में जीवन का संचार हुआ। वेनिस और पीसा के जेनोवा और अमाल्फी में जिन लोगों ने शासन या क्रय-विक्रय किया, उनके मन से व्यापारिक हित की बात कभी ओझल नहीं हुई। ख्2, धर्म युद्धों के परिणाम भी आशाओं के प्रतिकूल रहे। उन्हें ऐसी उपलब्धियाँ हुईं जिनके बारे में धर्मयोद्धाओं ने कभी सोचा भी नहीं था और ये उपलब्धियाँ किसी तरह कम भी नहीं थीं। फ्जमीन पर धर्म-युद्ध करने वाली शक्ति जब अपने उत्कर्ष पर थी, तभी अनेक पश्चिमी नगरों की समुद्री सम्पन्नता भी अपने चरम उत्कर्ष पर थी और धार्मिक युद्धों के समाप्त होने पर यह परिणाम निकला कि ईसाई व्यापार का विस्तार हुआ और प्राच्य तथा मौरीटेनिया सभ्यता का इसमें आत्मसात हो गया। इस महायुद्ध के परिणामस्वरूप पूर्व और पश्चिम में जो भेंट हुई उससे राजनैतिक दृष्टि से यूरोप और कैथोलिक जगत को स्थाई रूप से बहुत कम लाभ हुआ। दूसरी ओर इसके परिणामस्वरूप ईसाई देशों ने वाणिज्य के माध्यम से अपना भविष्य सुधारने की ओर ध्यान दिया। योद्धाओं का मोर्चों पर आक्रमण असफल रहा, लेकिन धर्म की इस लड़ाई से एक नयी संस्कृति और ज्ञान के भरपूर और विपुल धन-दौलत एक अधीर किन्तु अटल महत्त्वाकांक्षा का आयात, जिसके पन्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में आयी नवचेतना में देखने को मिली, जब भूगोल तथा प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी खोजें हुईं और यूरोप की हथियारों तथा उद्यम का पूरे विश्व में गुणगान होने लगा। ख्3, उपरोक्त

  1. ब्रेसली और रोबिन्सन द्वारा फ्आउटलाइंस ऑफ यूरोपियन हिस्ट्रीय् भाग-1, पृष्ठ 471 में उद्धृत

  2. ब्रेसली, खंड-2, पृष्ठ 408

  3. ब्रेसली, खंड-2, पृष्ठ 395