अध्याय-2 : मध्ययुग में भारत के व्यापारिक सम्बन्ध अथवा इस्लाम का उदय और पश्चिमी यूरोप का विस्तार - Page 58

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का व्यापार नहीं होता था। वाइकिंग एक साहसिक व्यक्ति था। उसने अपनी किस्मत सुधारने का पूरा प्रयास किया और अवसर आने पर एक रियासत में बस गया। जर्मनी के अन्य लोगों की तुलना में इन शहसवारों को कस्बों में रहने का अधिक शौक था। किंतु किसान तथा निवासी बनने से पहले इन शहसवारों ने शान्तिपूर्ण ढंग से चल रहे व्यापार में काफी बाधाएँ डालीं। इन शहसवारों के ईसाई बनने के बहुत बाद फलैमिश कस्बों में शान्तिपूर्ण व्यापार के आसार दिखाई दिए। इससे इंग्लैंड में ऊन के उत्पादन पर काफी प्रभाव पड़ा। फलैमिश व्यापारियों ने अपने को फलैमिश हाउस ऑफ लंदन के रूप में संगठित किया और इंग्लैंड को बदले में फलैमिश कपड़े मिलते थे। व्यापार को स्टैपिल कस्बों के द्वारा नियन्त्रित किया जाता था। यह उत्तरी जर्मनी के बहुत से कस्बों का एक महासंघ था। वह जर्मन हैनजीटिक लीग मध्य युग का बहुत विस्तृत व्यापारिक संगठन था। बाल्टिक क्षेत्रों के उत्पादों को लाकर जैसे इमारती लकड़ी, लाख, नमक, लोहा, चाँदी, नमक लगी तथा तली मछली, फर, अम्बर तथा कुछ मोटी वस्तुएँ, वे इन्हें दूर देशों से लायी गयी वस्तुओं से बदलते थे। इस प्रकार इटली के इन गणतन्त्रों के माध्यम से अरेबिया, पर्शिया, भारत, पूर्वी द्वीप भारतीय द्वीप समूह यहाँ तक कि चीन का माल प्राचीन काल की भाँति मध्य काल में भी लम्बे तथा कठिन मार्गों से पश्चिमी यूरोप में जाता रहा। कच्चा रेशम, कपास और इनसे बनी वस्तुएँ, नील और रंगाई के काम आने वाली अन्य वस्तुएँ, सुगन्धित लकड़ी और गोंद, नशीले पदार्थ तथा अन्य दवाएँ, मोती, रूबी, हीरे, नीलम, हरे-नीले रंग की मणि, दूसरे कीमती पत्थर, सोना व चाँदी और इसके अतिरिक्त खाद्य मसाले, मिर्च, अदरक, दालचीनी, लौंग व अन्य मसाले मात्र एशिया से प्राप्त किये जाते थे। ख्1, इस प्रकार एशिया और यूरोप के मध्य व्यापार स्थाई हो गया जो बहुत रास्तों से होता था।

परंतु आरम्भ में इस्लाम के उत्थान से इस प्रणाली में बाधा आयी। जब हम यह अनुमान लगाते हैं कि सभी कठिनाइयों के होते हुए व्यापारी जमीन मार्ग से व्यापार किया करते थे तो हम यह भी समझ सकते हैं कि अरबों की फौजों के तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर आने-जाने से व्यापार में क्या-क्या बाधाएँ होती होंगी। हमें याद होगा कि एशिया से यूरोप के बीच चार मुख्य व्यापार के मार्ग’’ थे। धर्म-युद्धों के दौरान जब तक फारस की खाड़ी तथा लाल सागर के बीच मार्ग पर परस्पर विरोधी मुसलमान शक्तियों का नियन्त्रण रहा, तब तक दूसरे अधिक महँगे और घुमावदार रास्ते से होकर जाना अनिवार्य हो गया था, जिसके कारण काफी दूरी तक जमीन से माल ले जाना पड़ता था और माल को कई बार हस्तांतरित करना पड़ता था। यह रास्ता सिंध नदी से होकर जाता था। पहाड़ों के पार जानवरों पर माल ढोया जाता था और वहाँ से आक्सस

  1. एडवर्ड स्लो पी थेनी, ‘सोशल एंड इंडस्ट्रियल हिस्ट्री ऑफ इंग्लैंड’, पृष्ठ-86