अध्याय 3
ब्रिटिश शासन से पूर्व का भारत
संसार में अन्य पद्धतियों की अपेक्षा साम्राज्यवाद की रक्षा की अधिक आवश्यकता होती है और साम्राज्यवादी व्यक्ति इस कर्तव्य में पीछे नहीं रहे हैं। जहाँ यूनानियों के पास साम्राज्यवाद के लिए एक शब्द तक नहीं था और न ही उन्हें नगर राज्य के संघ की कोई जानकारी थी वहीं रोमवासी संसार के प्रथम तथा सबसे महान शाही व्यक्ति थे और उन्होंने साम्राज्यवाद का औचित्य बतलाया जो उनके उत्तराधिकारियों की भी बपौती बन गया। उन्होंने घोषणा की कि वे उच्च कुल के व्यक्ति हैं और उनकी संस्कृति की किसी दूसरी संस्कृति से तुलना नहीं की जा सकती, उनकी प्रशासन पद्धति बेहतर है और वे जीवन की कलाओं में प्रवीण हैं। उन्होंने यह भी घोषणा की कि बाकी लोग निम्न कुल के हैं, उनकी संस्कृति घटिया है और वे जीवन की कलाओं से अनभिज्ञ हैं, और उनका प्रशासन अति निरंकुश है। इसके परिणामस्वरूप रोमवासियों ने तर्क दिया कि अपने निम्न कुल के भाइयों को सभ्य बनाना न कि इनको जीतना और मानवता के नाम पर अपनी संस्कृति उन पर थोपना उनका दैवी कार्य है। अंग्रेजों ने यही तर्क देकर भारत में अपनी साम्राज्यिक नीति को उचित बताया। भारत के ब्रिटिश इतिहासकारों को तारीफ करने की बीमारी है। उन्होंने भारत में अंग्रेजों से पूर्व के शासकों की बुराइयों का, न कि अच्छाइयों का बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन किया है। उन्होंने न केवल मुगल शासकों को निरंकुश शासक या लुटेरा बता कर उनकी निंदा की, बल्कि समूचे जन समुदाय और उनकी सभ्यता पर धब्बा लगाया। कोई व्यक्ति या कोई राज्य अपने को बड़ा जताने के लिए दूसरों के गुणों को कम करके बताता है तो यह स्वाभाविक है।
ब्रिटिश भारत के इतिहासकारों ने ब्रिटिश शासन की तुलना उनके कुछ पहले या बहुत पहले हुए शासकों से करने की गलती की है। इतिहास लिखने के नियमों को ध्यान में रखते हुए उन्हें भारत के शासकों की तुलना समकालीन इंग्लैंड के राजाओं से करनी चाहिए थी। यदि हम इस नियम का पालन करें तो ऐसी गलती नहीं होगी। हम नार्मन विजेताओं के अधीन आँग्ल सैक्सन लोगों की दयनीय दशा को याद करें तो हमें मुसलमानों के विजयी होने पर हिंदुओं की जो दयनीय दशा की गयी उस पर तिरस्कारपूर्ण घृणा नहीं होगी। नार्मन विजेताओं के अधीन अंग्रेज कहलाना अपमानजनक समझा जाता