अध्याय-3 : ब्रिटिश सरकार से पूर्व का भारत - Page 63

48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

किया जैसा पिता अपने परिवार पर करता है। उसके शासनकाल में देश काफी सम्पन्न रहा और पूरी तरह शन्ति रही। मराठा सम्प्रदायों में जो उत्तरकालीन मुगलों के समकालीन थे, लोगों की स्थिति के बारे में एक यात्री ने कहा है, मैंने मराठा प्रदेश में प्रवेश किया तो मैंने अपने आप को स्वर्णयुग की सादगी और खुशहाली में पाया, जहाँ प्रकृति अभी बदली नहीं थी और लड़ाई तथा गरीबी को कोई जानता भी नहीं था। जनता प्रसन्न, ओजस्वी तथा स्वस्थ थी। अतिथि का सत्कार करना सभी लोग अपना धर्म समझते थे, सभी द्वार खुले और मित्र, पड़ोसी तथा अजनबी जो कुछ भी वे चाहें, ले सकते थे। इसी प्रकार टीपू के शासनकाल में दक्षिण भारत के लोगों की दशा के सम्बन्ध में एक इतिहासकार का कहना है, फ्जब एक आदमी किसी अपरिचित देश से गुजरता है और यह देखता है कि वहाँ

खेती-बाड़ी अच्छी होती है, आबादी घनी है और लोग मेहनती हैं। नगर नये-नये हैं, व्यापार बढ़ रहा है, कस्बे बढ़ रहे हैं और हर चीज फल-फूल रही है अर्थात् वहाँ पर खुशहाली है तो स्वाभाविक रूप से वह इस निष्कर्ष पर पहुँचेगा कि वहाँ पर कोई जनता की हितैषी सरकार है। यह टीपू के अधीन प्रदेश की तस्वीर है। उसकी सरकार के बारे में यह हमारे विचार हैं।य् टीपू के अधीन जो क्षेत्र था वहाँ पर हर जगह घनी आबादी थी और कृषि योग्य समस्त भूमि में खेती होती थी। उसकी सरकार कठोर और निरंकुश थी, लेकिन यह निरंकुशता एक ऐसे कठोर और योग्य शासक की थी, जो जनता का विकास करता था और उसका दमन, जो उसके भावी ऐश्वर्य की वृद्धि का माध्यम होता है और वह आम तौर पर शत्रुओं पर ही अत्याचार करता है।

क्लाइव के अनुसार ‘‘बंगाल एक अपार धन-दौलत से सम्पन्न प्रदेश था।’’ मैकाले का कहना है कि फ्मुसलमानों के निरंकुश शासन तथा मराठा लुटेरों के बावजूद बंगाल पूर्व में समृद्ध राज्य के रूप में जाना जाता था। इसकी आबादी काफी बढ़ गयी थी। इसके अन्न भंडारों से दूरवर्ती प्रदेशों तक अनाज पहुँचता था और लंदन तथा पेरिस की कुलीन महिलाएँ यहाँ के करघों पर बने मुलायम वस्त्र पहनती थीं। लेकिन अंग्रेजों के आने से स्थिति बदलने लगी। भारत की धन-दौलत भारत से बाहर चल गयी और यह इंग्लैंड में जमा हो गयी। बुरी शक्तियाँ संसद व ईस्ट इंडिया कम्पनी दोनों पर छा गयीं।

कम्पनी राज बिल्कुल विवेकपूर्ण नहीं था। वह कठोर था। उसने सुरक्षा दी किन्तु धन-सम्पत्ति नष्ट कर दी। प्रशासन की योजना पूर्णता से कहीं दूर थी। एड मस्मिथ का कहना है कि व्यापारियों की यह कम्पनी प्रभुता सम्पन्न होने के बाद भी अपने को प्रभुता सम्पन्न नहीं समझ सकती थी। फ्व्यापार या दुबारा बेचने के लिए खरीदना, वे अपना मुख्य धन्धा समझते थे और यह कितनी विचित्र बात है कि वे राजा को व्यापारियों का एक सिरा मानते थे। उनके अनुसार एक राजा की दिलचस्पी उसी देश में होती है जिस पर वह

  1. वेल्थ ऑफ नेशंस (कैनर्स संस्करण), खड 2, पृष्ठ 136-137