अध्याय-3 : ब्रिटिश सरकार से पूर्व का भारत - Page 64

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शासन करता है, लेकिन एक व्यापारी की दिलचस्पी इसके ठीक विपरीत होती है।य् ख्1, एड मस्मिथ द्वारा मालिकों (प्रोपराइटर्स) और निदेशकों (डायरेक्टरों) की सभाओं की आलोचना का ब्यौरा अन्तिम अध्याय में दिया गया है जो बहुत महत्त्वपूर्ण है। उसका मानना है कि भारतीय स्टाक के प्रत्येक मालिक की दिलचस्पी किसी तरह भी वही नहीं हो सकती, जो उस देश की थी, जिसकी सरकार को वह अपने वोट के कारण प्रभावित कर सकता था। उसका कहना है फ्यह बिल्कुल सही होता, यदि उन मालिकों की कोई दूसरी दिलचस्पी नहीं होती और उनकी केवल उसी में दिलचस्पी होती, जो भारतीय स्टाक के मालिक के रूप में उनका था। लेकिन उनकी दिलचस्पी दूसरी थी जिसका बहुत अधिक महत्त्व है। प्रायः एक धनी व्यक्ति, कई बार कम साधन सम्पन्न व्यक्ति, तेरह या चौदह सौ पौंड केवल इसलिए देने के लिए तैयार हो जाता था कि वह वोट के आधार पर मालिकों की सभा पर कुछ प्रभाव डाल सकेगा। उसे लूट में तो नहीं लेकिन भारत के लुटेरों की नियुक्ति में भागीदारी का अधिकार मिल जाता था। यद्यपि निदेशक जो नियुक्तियाँ करते हैं, वे अनिवार्य रूप से मालिकों की सभा के नियन्त्रणाधीन होते हैं, जो न केवल उनका चुनाव करते हैं, अपितु कई बार उनकी नियुक्तियों को रद्द भी करते हैं। एक पर्याप्त साधन सम्पन्न व्यक्ति या कम साधन सम्पन्न व्यक्ति यदि वह कुछ वर्षों तक इस प्रभाव का प्रयोग कर सकता है, और इस प्रकार अपने कुछ मित्रों की भारत में नियुक्ति करवा सकता है तो वह प्रायः लाभांशों का बहुत कम ध्यान रखता है, जो उसे इतनी कम पूँजी से प्राप्त हो सकते हैं। जिस पूँजी के आधार पर उसे वोट देने का अधिकार मिला है वह पूँजी बढ़ती है या घटती है, इस ओर भी वह कोई ध्यान नहीं देता। महान साम्राज्य की खुशहाली या बर्बादी की, जिसकी सरकार में उस वोट से उसे भागीदारी मिली, उसे कोई चिंता नहीं होती। कोई दूसरा राजा अपनी प्रजा की खुशहाली या बर्बादी या अपने साम्राज्यों की उन्नति अथवा अवनति या फिर अपने प्रशासन के यश अथवा अपयश के प्रति इतना उदासीन नहीं रहा है और न ही रह सकता है जितना कि एक ऐसी व्यापारिक कम्पनी के अधिकांश मालिक अत्यंत सम्मोहक नैतिक कारणों से उदासीन रहते हैं और अनिवार्य रूप से रहना चाहिए।य् ख्1, यह सम्भवतया कम्पनी के प्रशासन पर एक गम्भीर आरोप है। तथापि यह कम्पनी के प्रारम्भिक प्रशासन की सही तस्वीर है, यद्यपि भ्रष्टाचार बाद में धीरे-धीरे समाप्त हो गया।

भारत की स्थानीय या सर्वोच्च सरकार में देश के मूल निवासियों की कोई आवाज नहीं थी। उच्च पदों पर उनकी नियुक्ति पर रोक लगा दी गयी थी और एक क्लर्क से ऊपर उठने की कोई गुंजाइश नहीं थी। आन्तरिक प्रशासन इस प्रकार का था कि गवर्नरों और शासकीय स्टाफ में सलाहकार की हैसियत से देश के निवासियों के लिए सभी प्रकार का चिंतन करते थे अथवा उन्हें करने के लिए बाध्य किया जाता था। उन्होंने सर जोंस बाउले

  1. वैल्थ ऑफ नेशंस (कैनर्स संस्करण), खड 2, पृष्ठ 139