अध्याय-3 : ब्रिटिश सरकार से पूर्व का भारत - Page 65

50 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

अथवा फ्निर्धन का मित्रय् (दी पुअर मैन्स फ्रेंड) की भूमिका बखूबी निभाई, जिसका वर्णन चार्ल्स डिकन्स ने इस प्रकार किया हैµ फ्प्रिय मित्र, आपका सम्बन्ध केवल मेरे साथ है। आपको कुछ सोचने का कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। मैं आपके लिए सोचूँगा, मैं जानता हूँ आपके लिए अच्छा क्या है, मैं आपका सनातन पिता हूँ, विधाता का यही विधान है। जो एक मनुष्य कर सकता है, वह मैं करता हूँ। गरीब आदमी के मित्र और पिता के रूप में अपना कर्त्तव्य करता हूँ। मैं उन्हें हर अवसर पर मुझ पर पूरी तरह निर्भर रहने की शिक्षा देता हूँ जो उस वर्ग के लिए आवश्यक है। उन्हें अपने बारे में सोचने की कोई आवश्यकता नहीं है।य्

ऐसे बाउले जैसे लोगों ने निस्सन्देह भगवान का आदेश मान कर सोच-विचार किया होगा, लेकिन दुर्भाग्य से और स्वाभाविक रूप से उनकी सोच-विचार और करनी निश्चित रूप से इंग्लैंड के लिए अनुकूल और भारत के लिए घातक सिद्ध हुई। इंग्लैंड किस प्रकार

खुशहाल हुआ जबकि भारत पतन की ओर गया, यह बात तब हमारे मन में अच्छी तरह स्पष्ट हो जाती है। जब हम यह याद करते हैं कि 1600 ई. से कुछ समय पहले और कुछ समय पश्चात् इंग्लैंड की आर्थिक स्थिति क्या थी और उसके आर्थिक विकास में भारत का क्या योगदान रहा।

सर जोसिया चाइल्ड ने 1545 के पश्चात इंग्लैंड की बढ़ती हुई खुशहाली के बारे में बहुत ही दिलचस्प तुलनात्मक ब्यौरा दिया है। उनके अनुसार 1545 में इंग्लैंड का व्यापार बहुत कम था और व्यापारी बहुत ही कम तथा इने-गिने थे। पहले ऐसे बहुत कम लोग होते थे, जिनके पास एक हजार पौंड होते होंगे, लेकिन अब ऐसे काफी लोग मिल जाएँगे जिनके पास दस हजार पौंड से भी अधिक सम्पत्ति होगी। यदि इसमें सन्देह हो तो हम बुजुर्गों से पूछ सकते हैं कि क्या साठ वर्ष पहले एक बेटी के पास पच्चीस सौ पौंड की जायदाद होना आज दो हजार पौंड की जायदाद होने से बड़ी जायदाद नहीं समझा जाता था और क्या उन दिनों कुलीन औरतें सर्ज गाउन पहन कर गौरव का अनुभव नहीं करती थीं जिसे आज एक नौकरानी को पहनते हुए भी शर्म महसूस होती है। जहाँ पहले एक गाड़ी होती थी, अब सौ गाडि़याँ हैं। हमारे पूर्वजों ने बीस वर्ष में जितना कर दिया होगा, हम अब उससे अधिक कर एक वर्ष में बड़ी आसानी से दे सकते हैं। हमें सीमा शुल्क से भी अब काफी अधिक आय होती है। मैं समझता हूँ अब हमें सीमा शुल्क के रूप में छह गुनी से भी अधिक आय होती है। यह वृद्धि वस्तुओं की दरों में वृद्धि से ही नहीं हुई अपितु व्यापार की मात्रा में वृद्धि के कारण अधिक हुई है। ख्1, 1600 ई. तक व्यापारी वर्ग इतना शक्तिशाली बन गया था कि फ्यदि व्यापारी वर्ग का वैर

  1. ‘डिस्कोर्स ऑफ ट्रेड’ (1775), पृष्ठ 8-10

  2. टी.बी. मैकाले, ‘हिस्ट्री ऑफ इंग्लैंड’, अध्याय 3