अध्याय-3 : ब्रिटिश सरकार से पूर्व का भारत - Page 66

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न होता तो चार्ल्स प्रथम कभी पराजित न होता और व्यापारी वर्ग ने सहायता न की होती तो चार्ल्स द्वितीय पुनः प्रतिष्ठित नहीं किया गया होता।य् ख्2, भारत ने इंग्लैंड की खुशहाली में अनेक प्रकार से योगदान किया अथवा उसे बाध्य होकर ऐसा करना पड़ा।

धन-दौलत बढ़ाने के लिए व्यापार का सबसे अधिक महत्त्व है। स्टाक के भावों से परिस्थितियों का पता चलता है। यही मापदंड लागू करने पर हमें पता चल जाएगा कि भारत के व्यापार का इंग्लैंड में कितना महत्त्व थाः फ्18वीं शताब्दी के दौरान कम्पनी के स्टाक का मूल्य सदैव अधिक रहा। 1720 में इसका भाव 450 पौंड था किन्तु 1775 में यह घटकर 148 पौंड हो गया। यह भाव लगभग वास्तविक मूल्य के बराबर ही था। औसत लाभांश 10

प्रतिशत मान लें, तो इसका अर्थ लागत मूल्य पर लगभग प्रतिशत ब्याज होगा। इसका गिरना 1766 तक जारी रहा, जब बंगाल की माल गुजारी से लाभ की सम्भावना से बाजार में कृत्रिम रूप से तेजी आयी, जिससे इसका भाव बढ़ कर 233 पौंड हो गया। कर्नाटक में युद्ध के परिणामस्वरूप इसके भाव 60 प्रतिशत गिर गये। 1779 से 1788 तक कीमत बहुत उचित रही। यह औसत 150 पौंड रही यद्यपि 1784 के संकट के समय कम होकर 118 पौंड रह गयी थी। पिट्स एक्ट के पश्चात् कीमतें बढ़ीं और 1787 तक इसका भाव 185 पौंड 10 शि. हो गया। इसके बाद भावों में उतार-चढ़ाव बहुत कम हुआ। कम्पनी अब प्रभुता सम्पन्न शासक बन गयी थी और यह अब एक व्यापारिक निगम नहीं रह गयी थी। कम्पनी अपने शेयरधारियों को उचित ब्याज देने लगी और इसके स्टाक का भाव इसके लाभ के पूँजीकृत मूल्य के बराबर हो गया। सट्टेबाजी की अब कोई गुंजाइश नही थी। इसका तुलन-पत्र भारत के बाद के वर्ष के बजट से मेल खाने लगा। ख्3, शेयरधारियों को दिये गये लाभांश से भी स्पष्ट हो जाएगा कि भारत ने इंग्लैंड की सम्पत्ति में कितना योगदान किया। 1709 की यूनियन से पूर्व, व्यापार में यदि काफी उतार-चढ़ाव आता था, तो भी इसमें सदैव काफी लाभ होता था। 1682 में लाभांश 160 प्रतिशत तक पहुँच गया, लेकिन शताब्दी के अन्त में स्थिति काफी बदल गयी। 1709 में यूनियन के बाद यह मात्र 8 प्रतिशत रह गया जो 1710 में बढ़ कर 9 प्रतिशत हो गया और दो वर्ष बाद 10 प्रतिशत हो गया। इस शताब्दी के दौरान औसत दर 9 प्रतिशत रही और केवल 1768 से 1771 के बीच इसकी दर में वृद्धि हुई। 1723 में थोड़ी गिरावट फ्राँस की कम्पनी की प्रतिस्पर्धा के कारण हुई। उसके पश्चात् एक फीसदी की गिरावट पूँजी में वृद्धि और 1732 में स्वीडन की एक कम्पनी की स्थापना के बाद हुई। परन्तु 1774 में लाभांश की दर बढ़ कर पुनः 8 प्रतिशत हो गयी। कारनाटिक तथा यूरोप में लगातार युद्ध होते रहने के बावजूद यही दर बनी रही। ख्1, 1755 में अव्यवस्थित दशा ने आखिरकार प्रभावित किया और परिणामस्वरूप लाभांश दो प्रतिशत गिर गया। 1760 में वर्द्धमान व अन्य प्रांतों के द्वारा हथियार डाल दिये जाने पर कम्पनी का खर्च बढ़ गया

  1. एफ.पी. रोबिन्सनµफ्ईस्ट इंडिया कम्पनी’ पृष्ठ 161