अध्याय-3 : ब्रिटिश सरकार से पूर्व का भारत - Page 67

52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

और लाभांश 6 प्रतिशत रखा गया और इस प्रकार हर साल 1,91,644 पौंड लाभांश के रूप में बाँटे गये। 1767 में बंगाल की क्षेत्रीय सार्वभौमिकता स्वीकार करने के परिणामस्वरूप लाभांश की दर बढ़ा कर 10 प्रतिशत कर दी गयी और 3,19,408 पौंड लाभांश के रूप में बाँटे जाने लगे। यह वृद्धि अनुचित थी और इसका मुख्य कारण यह था कि भारत की सम्पन्नता के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर अनुमान लगाया गया था। अधिक लाभ होने की उम्मीद में पहले से ही लाभांश बढ़ाकर घोषित कर दिया जाता, लेकिन वास्तव में लाभ कभी भी अधिक नहीं होता था। अधिक लाभांश का भुगतान ब्याज की ऊँची दरों पर ऋण लेकर क्या जाता था। कम्पनी पाँच वर्ष तक अच्छे दिन आने की उम्मीद में लड़ती रही, लेकिन 1772 में एकदम कि गरावट आयी और लाभांश 12 प्रतिशत से घटकर 6 प्रतिशत हो गया। तब लार्ड नार्थ ने हस्तक्षेप किया और लाभांश के मामले में सरकार की अनुमति लेना कम्पनी के लिए आवश्यक हो गया। इससे कम्पनी की आय बढ़ी और लाभांश धीरे-धीरे बढ़ता गया। 1792 में टीपू के साथ शान्ति सन्धि का परिणाम यह हुआ कि इससे कम्पनी को 2,40,000 पौंड का राजस्व प्राप्त हुआ और 1,600,000 पौंड क्षतिपूर्ति के रूप में मले। इससे लाभांश 2 प्रतिशत और बढ़ गया और 1802 में लाभांश 11 प्रतिशत हो गया। ख्2, इसके अलावा ईस्ट इंडीज में व्यापार करने वाली यूनाइटेड कम्पनी ऑफ मर्चेन्ट्स ऑफ इंग्लैंड द्वारा विशेषाधिकार प्राप्त करने के कारण इंग्लैंड की जनता को 1798 से 1803 के बीच श्री मैकफरसन के अनुसार 25,343,215 पौंड की राशि का भुगतान किया गया। ख्1, भारत ने इंग्लैंड की अमरीका के साथ लड़ाई में 3,858,666 पौंड की मदद देकर ही सहायता नहीं की, अपितु अमरीका में शिक्षा का प्रसार करने में भी सहायता की। यह बात इस तथ्य से स्पष्ट हो जाती है कि श्री येल द्वारा अपने नाम से स्थापत येल कॉलेज की स्थापना, एक मात्र भारत के साथ व्यापार से हुई आय से की गयी। इंग्लैंड को भारत से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जो लाभ हुए उनमें से कुछ सेंट जार्ज टकर के अनुसार इस प्रकार हैं µ (1) ईस्ट इंडिया कम्पनी को समय-समय पर क्षेत्रीय ऋण पर ब्याज का भुगतान करने के पश्चात् अपने अधिकृत क्षेत्रों से 15 लाख पौंड तक की अतिरिक्त आमदनी हुई और यह अधिशेष स्पष्ट रूप से भारत की ओर से इंग्लैंड को एक सीधा योगदान था। (2) लगभग 415 भाग क्षेत्रीय ऋण यूरोपीय ब्रिटेन के नागरिकों के नियन्त्रण में होने के कारण करीब 20 लाख पौंड के वार्षिक ब्याज की राशि में से अधिकांश राशि को भारत द्वारा इंग्लैंड को अप्रत्यक्ष रूप से दिया गया योगदान समझा जाना चाहिए। इस अप्रत्यक्ष अथवा प्राइवेट योगदान में बचतों, व्यापार से होने वाले लाभ को शामिल कर लिया जाये तो कुल राशि इस समय अर्थात् 1821 में श्री टकर के अनुमान के अनुसार 30 लाख रुपये बैठती है। (3) पूर्वी समुद्रों में एक पत्तन से दूसरे पत्तन

  1. एफ.पी. राबिन्सन, ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’, पृष्ठ 159-161

  2. ‘यूरोपियन कॉमर्स विद इंडिया’ (1812), परिशिष्ट-2

  3. ‘यूरोपियन कॉमर्स विद इंडिया’ (1812), परिशिष्ट-2