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इसके अलावा भारत की मुद्रा भी एक नहीं थी। अतः इन सभी चीजों से भारत के उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। फ्रेडिरिक लिस्ट का कहना है- फ्यदि उन्होंने भारत में बने सूती व रेशमी कपड़ों का इंग्लैंड में निःशुल्क आयात करने की अनुमति दे दी होती तो इंग्लैंड के कपास और रेशम के कपड़ा निर्माताओं को जल्दी ही बात समझ में आ जाती। भारत में न केवल मजदूरी और कच्चा माल ही सस्ता था, अपितु इसे सदियों का अनुभव और कौशल भी प्राप्त था।य्
श्री एच.एच. विल्सन, भारत के इतिहासकार का विचार और अधिक सुनिश्चित है। उन्होंने स्वीकार किया है कि यह एक शोचनीय दृष्टान्त हैµ फ्उस देश ने भारत के साथ काफी अन्याय किया है, जिस पर वह आश्रित हो गया है। 1813 के साक्ष्य में बताया गया कि उस समय तक भारत के सूती और रेशमी कपड़े इंग्लैंड के बाजार में मुनाफे पर बेचे जा सकते थे और जिस मूल्य पर इंग्लैंड में ऐसे कपड़े बेचे जाते थे वह इंग्लैंड में बने कपड़ों के मूल्य के 50 से 60 प्रतिशत कम होता था। इसके परिणामस्वरूप भारत में बने कपड़ों पर उनके मूल्य के आधार पर 70-80 फीसदी शुल्क लगाकर या उन पर रोक लगा कर इंग्लैंड में बनने वाले वस्त्रों की रक्षा करना आवश्यक हो गया। यदि ऐसा न किया गया होता, यदि निषेधात्मक शुल्क और डिक्री न लगी होती तो वैसले और मैनचेस्टर की मिलें शुरू में ही बन्द हो गयी होतीं और भाप की शक्ति से भी मुश्किल से ही पुनः चालू हुई होतीं। भारत के उद्योगों को बलि चढ़ाकर ही इन्हें स्थापित किया गया। भारत उस समय आजाद होता तो जरूर बदला लेता, ब्रिटेन की चीजों पर निषेधात्मक शुल्क लगाता और इस प्रकार अपने उत्पादनकारी उद्योग को नष्ट होने से बचाता। परन्तु भारत को आत्मरक्षा में ऐसी कार्यवाही नहीं करने दी गयी। भारत एक विदेशी शक्ति की दया पर निर्भर हो गया। ब्रिटेन का सामान शुल्क दिये बिना भारत पर थोप दिया गया और विदेशी निर्माता ने, भारतीय प्रतियोगी को दबाए रखने और अन्ततः उसका गला घोटने के लिए जिसका वह समान परिस्थितियों में मुकाबला नहीं कर सकता था, राजनैतिक अन्याय का सहारा लिया। श्री चैपलिन के शब्दों मेंµ ‘‘इसका परिणाम यह हुआ कि कई निर्माता अपने निर्वाह के लिए कृषि कार्य करने लगे हैं, जबकि इस क्षेत्र में पहले ही जरूरत से ज्यादा लोग कर रहे हैं।य्
इस प्रकार भू-राजस्व नीति ने कृषि को नष्ट कर दिया और इंग्लैंड की निषेधकारी संरक्षणात्मक नीति ने उस देश के उद्योगों को नष्ट कर दिया, जिसकी धन-दौलन पर वे मधु-मक्खियों की तरह मंडराने लगे और जिसने उन्हें सराबोर कर दिया।
इसके परिणामस्वरूप भारत के लोगों की हालत बहुत ही जर्जर हो गयी। इसका अनेक यात्रियों तथा गवर्नरों ने मार्मिक वर्णन किया है। पादरी हैवर ने जिसने 1830 के आसपास भारत की यात्रा की, लिखा है फ्मैं समझता हूँ कि करों की वर्तमान दरें होने पर न तो मूल निवासी और न ही यूरोपीय कृषक फल-फूल सकते हैं।य् आधी कृषि उपज सरकार