60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
ले लेती है और यह दर जो लगभग औसत दर है जहाँ कहीं स्थाई बन्दोबस्त नहीं है, इतनी अधिक है कि इससे वर्तमान आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं होतीं, जबकि भारतवासी मितव्ययी आदत के हैं और बहुत ही अकृत्रिम तथा सस्ते ढंग से खेती करते हैं। अधिक दुःख की बात यह है कि ऐसी स्थिति में कोई सुधार नहीं किया जा सकता और अच्छी फसल होने पर भी लोग दरिद्र रहते हैं। जब फसल थोड़ी भी खराब होती है, तो सरकार के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि यह छूट देने और वितरण करने पर बहुत व्यय करे। ऐसा होने पर भी अनेक नर-नारी तथा बच्चों की मृत्यु हो जाती है और सड़कों तथा गलियों में शवों के ढेर लग जाते हैं। बंगाल में जहाँ भूमि उपजाऊ होने के साथ-साथ स्थाई निर्धारण है कभी अकाल नहीं पड़ता। दूसरी ओर हिन्दुस्तान (उत्तरी भारत) में राजा के अधिकारियों की यह आम धारणा है और कुछ परिस्थितियों के कारण मुझे भी उनसे सहमत होना पड़ा कि कम्पनी के प्रांतों से किसानों की हालत कुल मिला कर बहुत ही
खराब है और वे देशीय राजाओं की प्रजा से अधिक निर्धन और निराश हैं और यहाँ मद्रास में जहाँ जमीन आम तौर पर खराब है, अन्तर और भी अधिक है। तथ्य यह है कि कोई भी देशी राजा ऐसा लगान नहीं लेता जो हम लेते हैं। इस बात का ध्यान रखते हुए कि हमारी प्रणाली सुव्यवस्थित है, मुझे ऐसे बहुत कम लोग मिले, जिन्होंने गुप्त रूप से हमें यह न बताया हो कि लोगों पर कर अधिक लगाए गये हैं और देश धीरे-धीरे कंगाल होता जा रहा है। समाहर्ता सरकारी तौर पर यह स्वीकार नहीं करना चाहते। निस्सन्देह बीच-बीच में कोई योग्य समाहर्ता लोगों पर लगने वाले करों की दर कम करने में सफल हो जाता है, जबकि परिश्रम करके राज्य के लिए अधिक वसूली करता है।
लेकिन आमतौर पर वे धुँधली तस्वीरें पेश नहीं करते क्योंकि वे उनका प्रतिबिम्ब होती हैं और ऐसा करने पर मद्रास अथवा कलकत्ता के सचिव उनकी निन्दा कर सकते हैं। सचिव भी अपनी ओर से जिस सत्यनिष्ठा से निदेशक अधिक धन की माँग करते हैं उसकी वकालत करते हैं। व्यापार और उद्योग के बारे में उनका कहना है, फ्सूरत में अब बहुत कम और केवल कपास का व्यापार होता है, जो नावों में बम्बई भेजी जाती है। देश का तैयार माल अंग्रेजों द्वारा काफी सस्ता बेचा जाता है। इस कारण देशी व्यापारियों की स्थितियों मे काफी गिरावट आयी है।य् ढाका के पतन के बारे में उसी अधिकारी का कहना है, फ्इसका व्यापार घट कर पहले की अपेक्षा सातवाँ हिस्सा रह गया है और इसकी सभी शानदार इमारतें व कारखाने और फ्राँस, डच, पुर्तगाली राष्ट्रों के गिरजाघर
खंडहर बन गये हैं जिन्हें जंगलों ने ढक लिया है।
अपनी दुर्दशा को सुधारने के लिए मूल निवासियों ने संसद को यह कहते हुए आवेदन किया, फ्अन्य देशों में बनी तथा ब्रिटेन के उद्योग द्वारा निर्मित वस्तुओं के इंग्लैंड से भारत को निर्यात के मामले में हर सम्भव प्रोत्साहन दिया जाता है, जबकि भारत के कई हजार मूल निवासी जिनका कुछ समय पूर्व तक आजीविका का साधन कपास की