अध्याय-3 : ब्रिटिश सरकार से पूर्व का भारत - Page 76

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खेती करना और कपास के कपड़े बनाना था, आज भूखे मर रहे हैं क्योंकि इनका स्थान अब अमरीका के उत्पाद तथा इंग्लैंड के निर्माण उद्योग ने ले लिया है।य् लेकिन अपील व्यर्थ गयी और उनकी नजरों में इंग्लैंड का हित ही सदैव सर्वोपरि रहा, जिन्हें विधाता ने भारत का शासक बनाया था।

यद्यपि, जैसा कि पादरी हेबर ने ठीक ही कहा है, कम्पनी के अधिकारी लोगों की दुर्दशा की धूमिल तस्वीरें नहीं देते। उनमें ऐसे लोग भी हैं जो स्वतन्त्र विचारों के होने के कारण ऐसी चीजें स्पष्ट रूप से कहते हैं।य्

निदेशकों की कोर्ट ने 7 मई, 1766 को लिखा, फ्हमें अपने नौकरों के भ्रष्टाचार और लाभ तथा पूरे उपनिवेश में आचरण की व्यापक चरित्रहीनता से उत्पन्न शोचनीय स्थिति का बोध है। हम मानते हैं कि बहुत ही अन्यायपूर्ण और दमनात्मक आचरण से विपुल सम्पत्ति एकत्र की गयी है, जिसकी मिसाल पहले किसी देश में नहीं मिलती।य्

क्लाइव यद्यपि स्वयं एक अपराधी था, दमन के बारे में जानता भी था, क्योंकि उसने 18 सितंबर, 1766 को जार्ज डुडले को लिखा, फ्पिछले कई वर्षों में जो कुछ हुआ है, उसकी जाँच की जाये तो ऐसी चीजें सामने आएँगी, जो हमारा नाम रोशन नहीं करेंगी, अपितु उनसे देश की बदनामी होगी, साथ ही महान तथा अच्छे परिवारों की प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचेगी।य्

सर थामस मुनरो कम्पनी के कुशासन से इतना रुष्ट था कि उन्होंने कहाµ फ्हमारी शासन प्रणाली से पूरे समाज की इतनी अवनति हो इससे बेहतर होगा कि हमें देश से निष्कासित कर दिया जाए।य् श्री मार्टिन ने अपनी ‘ईस्टर्न इंडिया 1838’ में कहा है फ्ब्रिटिश भारत पर 3000,000 पौड का सालाना खर्चा 12 प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्याज (सामान्य भारतीय दर) पर तीस वर्षों में 723,900,000 पौंड हो जाता है। लगातार इतना

खर्चा इंग्लैंड में होता तो इंग्लैंड जल्दी कंगाल हो जाता, ऐसी स्थिति में भारत पर इसका कितना गंभीर प्रभाव पड़ा होगा, जहाँ एक मजदूर को एक दिन में 2 या 3 पैसे मजदूरी मिलती है। यदि भारत में रहने वाले 10 करोड़ ब्रिटिश नागरिक उपभोक्ता बन जाते, तो ब्रिटेन की पूँजी कौशल और उद्योग को कितना बड़ा बाजार मिल गया होता।य् बंगाल सिविल सेवा के फ्रडरिक जान शोर ने कारुणिक ढंग से कहा, फ्लेकिन भारतीयों के शान्तिपूर्ण दिन समाप्त हो गये हैं। भारत की विपुल धन-दौलत में से काफी धन खर्च हो गया है। भारत की शक्ति स्वार्थपरायण कुप्रशासन के कारण कम हो गयी है, क्योंकि लाखों लोगों के हित को तिलांजलि देकर केवल कुछ ही लोगों को लाभ पहुँचाया गया है। ब्रिटिश सरकार ने जो शासन प्रणाली स्थापित की, उससे देश तथा देश की जनता धीरे-धीरे कंगाल हो गयी। ब्रिटिश सरकार की लूट-खसोट से देश तथा जनता इतनी कंगाल हो गयी है कि इसकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती। अंग्रेजों का मूल सिद्धान्त पूरे भारतीय राष्ट्र को हर प्रकार से उनके अपने हितों को बढ़ावा देने का एक