अध्याय-3 : ब्रिटिश सरकार से पूर्व का भारत - Page 77

62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

साधन मात्र बनाना था। यदि हमारा उद्देश्य लोगों का कल्याण करना होता, तो एक अलग ही रास्ता अपनाया गया होता और एक अलग ही परिणाम निकलता।य्

लेकिन ऐसा नहीं होना था, बल्कि ऐसा होता तो अस्वाभाविक होता, क्योंकि मिल का कहना है, फ्एक जाति की सरकार का एक अर्थ होता है और यह वास्तविकता है, लेकिन एक जाति के लिए दूसरी जाति द्वारा सरकार न होती है और न हो सकती है। एक जाति दूसरी जाति को अपने निजी लाभ के लिए रख सकती है। उनसे धन कमा सकती है और उनका अपने निवासियों के लिए प्रयोग कर सकती है।य्

ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रशासन रोमन प्रांतीय प्रशासन का प्रतिरूप था। तथापि रोम साम्राज्य के अधीन स्थानीय स्वतन्त्रताएँ सुरक्षित थीं। मोनसेन का कहना है, फ्रोमन प्रांतीय संविधान के अन्तर्गत रोमन गवर्नर को वास्तव में केवल सैनिक शक्ति प्राप्त थी, जबकि प्रशासन और न्याय व्यवस्था समुदायों के हाथ में था अथवा उन्हें देना अभिप्रेत था, ताकि जीवन के लिए आवश्यक अपूर्व राजनैतिक स्वतंत्रता, साम्प्रदायिक स्वतन्त्रता के रूप में सुरक्षित रखी जा सके।य्

लेकिन अंग्रेजों ने हर चीज का दमन किया और जैसा कि श्री फैरेरो ने कहा है, फ्हमें इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि रोम द्वारा अपने प्रांतों का प्रशासन उदार भावना से चलाया जाता था, आम लोगों के हित का ध्यान रखा जाता था और प्रजा की भलाई के लिए सरकार द्वारा लाभप्रद सिद्धान्तों का पालन किया जाता था,य् उसी प्रकार हमें ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रशासन के बारे में इतिहासकारों में व्याप्त उपकारी दृष्टिकोण से भी सावधान रहना चाहिए, जो यह दर्शाने का भरसक प्रयास करते हैं कि 1700 वर्षों के अन्तराल में नैतिक स्तर की दृष्टि से मानव स्वभाव में काफी सुधार हुआ है।

ईस्ट इंडिया कम्पनी से पूर्व की स्थिति के बारे में हमारी चर्चा यहाँ संक्षिप्त रही है, लेकिन फिर भी यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि मुगलों और मराठों का स्थान लेने वाले लोगों का नैतिक स्तर अधिक ऊँचा नहीं था और तथाकथित देशज निरंकुश शासकों तथा लुटेरों के अधीन भारत की आर्थिक स्थिति उन लोगों के शासनकाल में आर्थिक स्थिति से बेहतर थी, जो उच्च संस्कृति होने की डींग मारते थे।

जिस समय ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से शासन सँभाला, उस समय भारतीय उद्योग नष्ट हो गये थे, कृषि पर आश्रित लोगों की संख्या अत्यधिक हो गयी थी, इस पर बोझ काफी बढ़ गया था और उत्पादकता इतनी कम हो गयी थी कि इसके लिए करों का बोझ वहन करना कठिन हो गया था और मूल निवासियों के लिए आजीविका के बहुत कम साधन रह गये थे।