66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
की वजह से ही मध्य युगीन यूरोप में मसालों की हर जगह इतनी अधिक माँग थी।
दूसरा प्रश्न यह है कि यूरोप के राष्ट्रों के लिए भारत पहुँचने का सीधा समुद्री मार्ग खोजना व मसाले ले जाना क्यों आवश्यक था? यूरोप के राष्ट्रों द्वारा भारत के लिए सीधा समुद्री मार्ग खोजे जाने से पूर्व भारत के लिए बरास्ता आशा अन्तरीप तीन सड़क मार्ग थे, जिनके द्वारा आराम का सामान व मसाले यूरोप पहुँचते थे। ये मार्ग उत्तरी, मध्य व दक्षिणी मार्ग कहलाते थे।
उत्तरी मार्ग सुदूर पूर्व और पश्चिम के बीच या जो चीन के भीतरी प्रदेशों से आरम्भ होकर पश्चिम की ओर बड़े रेगिस्तान गोबी को पार करता हुआ सैलेस्टियस पहाड़ के दक्षिण में होकर लोपझील जाता था और उसके बाद पुराने नगरोंµ खोजान, मारकंड, कशगर, समारो तथा बुखारा की शृंखला को पार करके अन्त में कैस्पियन सागर के क्षेत्र में पहुँचाता था। यह मुख्य उत्तरी मार्ग, उन अन्य मार्गों से जुड़ा हुआ था, जो हिमालय और हिन्दूकुश से गुजरते थे और भारत तथा चीन के माल को संयुक्त धारा में लाते थे। रेगिस्तान व पहाड़ की अस्सी से सौ दिन की यात्रा, चीन की दीवार व कैस्पियन सागर के मध्य होती थी। चीन में इसके भी उत्तर में एक समानान्तर सड़क रेगिस्तान व पहाड़ों के उत्तर व बलकाश झील से होकर उसी पुराने शहर कैस्पियन सागर के पूर्व पहुँचती थी। यहाँ कारवाँ के मार्ग फिर अलग हो जाते थे। कुछ दक्षिण पश्चिम चले जाते थे जहाँ वे अधिक केन्द्रीय मार्गों से मिल जाते थे जिनका वर्णन पहले हो चुका है और अन्ततः एशिया माइनर व सीरिया से होते हुए काला सागर व भूमध्य सागर पहुँचते थे। दूसरे कैस्पियन सागर के उत्तरी तट के आसपास सड़क मार्ग से गुजरते थे या इसको पार करते थे और अस्ट्राखान पहुँचते थे जहाँ से रास्ता वोल्गा होकर नदियों को पार करके अन्तिम स्थान टाना काले सागर के पास डोन के मुहाने या क्रीमिया के काफा स्थान पर पहुँचते थे।
मध्य मार्ग मैसोपोटामिया और सीरिया होकर लेवात जाता था। भारत के जहाज एशियाटिक तट के साथ-साथ फारस की खाड़ी तक जाते थे। और अपना कीमत सामान चलदिया या निचले यूफ्रेटस के बाजारों में बेचते थे। व्यापारिक नगरों की एक पंक्ति इसके तट पर
खाड़ी के मुहाने के पास ओरजम से बसरा तक जाती थी और इन चीजों से लदे जहाज इन सभी नगरों में सामान उतारने के लिए रुकते थे। इनमें से बहुत से तटवर्ती शहर कारवाँ का अन्तिम स्टेशन थे। ये मार्ग फारस के विभिन्न प्रांतों से मिले हुए थे और अफगानिस्तान के दर्राओं से होकर उत्तरी भारत पहुँचते थे। फारस की खाड़ी के ऊपर से एक मार्ग टिगरी होकर बगदाद जाता था। इस बिन्दु से माल व्यापारियों द्वारा कुर्दिस्तान के रास्ते फारस की उत्तरी राजधानी टेबरिज और वहाँ से पश्चिम की ओर या तो काले सागर या भूमध्य सागर के किनारे लेयास ले जाया जाता था। एक और मार्ग ऊँटों के लिए था, जो बसरा से पश्चिम की ओर फैले हुए रेगिस्तान से होते हुए सीरिया के नगर अलैप्टो, एंटिपोच ओर दमस्कस पहुँचता था। अन्त में वे भूमध्य सागर के किनारे लाओडीसिया, ट्रिपोली, बेरूत या जाफा पहुँचते थे, जबकि कुछ माल तो दूर दक्षिण में अलेक्जेंड्रिया ले जाया जाता था।