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दक्षिणी मार्ग आखिर के कुछ स्थानों को छोड़कर पूरा समुद्री मार्ग ही था। यह लाल सागर से गुजरता था और इसके रास्ते से भारत और सुदूरपूर्व का माल, समुद्र के रास्ते मिस्र लाया जाता था। वहाँ से नील के मुहाने से होकर यूरोप जाता था।
भूमि मार्ग चक्करदार और खतरनाक थे। वे असुरक्षित थे और उनसे माल ढोना कठिन और महँगा था। डाकू व्यापारियों को लूट लेते थे। सरकार उन पर बेहिसाब कर लगाती थी। दो भूभागों में उत्तरी राजमार्ग मध्य मार्ग की तरह नहीं था, चूँकि उस मार्ग से केवल ऊँट ही आते जाते थे। यह मार्ग गर्म और वीरान क्षेत्रों से गुजरता था अतः यह छोटे सामान के लिए ठीक था। पर मध्य मार्ग जैसा महत्त्व इसे कभी नहीं मिला। और वह मध्य मार्ग अथवा इंडेम्सीरियन मार्ग भी सदैव खुला नहीं रहता था। एक दो बार बन्द हुआ। पहली बार 632-651 ई. के बीच, जब सरासन अरबों ने इस्लाम के आवेग में इंडो-सीरियन मार्ग के देशों को जीत लिया। दूसरी बार से 11वीं शताब्दी में ईसाइयों के धर्मयुद्ध के बाद बन्द किया गया। दक्षिणी मार्ग भी जिसका एक बड़ा भाग समुद्री मार्ग था, समान रूप से असुरक्षित था। हिन्द महासागर और इसके निकटवर्ती समुद्रों के तूफानों से पूर्वी देशों के मजबूत जलपोत नष्ट हो जाते थे। समुद्री डाकू भी जलपोतों को नष्ट करने में पीछे नहीं थे। इसके अलावा अन्तर्देशीय बाजारों की अपेक्षा पत्तनों पर आर्थिक शुल्क की अदायगी करनी पड़ती थी। किंन्तु जैसा कि चेनस ने कहा है, फ्इन सभी बाधाओं के बावजूद पूर्वी देशों का काफी माल भूमध्य देशों में पहुँचता था और यूरोपीय व्यापारियों को उपलब्ध था।य्
जब ये भूमि मार्ग थे तो समुद्री मार्ग की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसका उत्तर है कि आगे एशिया में तुर्की व मंगोल उथल-पुथल हुई, जिसने अरब संस्कृति को समाप्त कर दिया और यूरोप के साथ व्यापार को नष्ट कर दिया। यह उथल-पुथल एक नयी शक्ति थी। यह उथल-पुथल पहली बार 1038 में हुई अब हठधर्मी तुर्क पर्शिया पर टूट पड़े। दो शताब्दी बाद मंगोल चंगेजखाँ के नेतृत्व में एशिया में फैल गये। 1258 ई. में मंगोलों ने बगदाद जीता। 1403 में तैमूर ने सीरिया जीता। 1453 ई. में कुस्तुनतुनिया, तुर्कों के अध्किर में आ गया। मंगोलों और तुर्कों की इस उथल-पुथल से दोनों भूमार्ग पूरी तरह बन्द हो गये। दक्षिणी मार्ग ही कुछ समय के लिए खुला रहा। जब तुर्कों ने 1516 में मिस्र को जीत लिया, तो यह मार्ग भी बन्द हो गया।
यूरोप के राष्ट्रों को भारत में लाने के लिए दो तथ्य जिम्मेवार हैं। पहला मसाले और दूसरा पुराने थल व्यापार मार्गों का तुर्कों और मंगोलों द्वारा बन्द किया जाना। इन्हीं कारणों से यूरोप के राष्ट्रों को भारत के लिए समुद्री मार्ग खोजने पड़े थे, जो अन्ततः उन्हें मिल गये।
यूरोपीय लोग, ईस्ट इंडीज में व्यापार करने के लिए आये थे, लेकिन उन्होंने इसे जीतने का इरादा बना लिया। इसके परिणामस्वरूप प्रभुत्व के लिए लड़ाई छिड़ गयी। एक ओर अंग्रेजों और दूसरी ओर पुर्तगालियों तथा डचों के बीच व्यापार के क्षेत्र में प्रभुत्व जमाने की