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भारत के राज्य उस सेना के द्वारा जीते गये जिसका लगभग पाँचवा भाग अंग्रेज थे। लेकिन हम इस उपलब्धि का अधिक श्रेय ही नहीं लेते, अपितु इस उपलब्धि के बारे हमारी धारणा ही गलत है। शेष 80 प्रतिशत सैनिक किस जाति के थे? वे तो भारत के देशज ही थे। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि भारत विदेशियों द्वारा जीता गया, उसने स्वयं को स्वयं जीता है। ख्1,
यहाँ तक तो प्रो. सीली का यह स्पष्टीकरण सही है। लेकिन यह बहुत दूर तुम नहीं जाता। भारत को भारतवासियों से बनी सेना की सहायता से ही अंग्रेजों ने जीता था। भारतीयों और अंग्रेजों को यह तथ्य नहीं भूलना चाहिए। लेकिन ये कौन से भारतीय थे जो विदेशियों की फौज में भर्ती हुए। यह प्रश्न प्रो. सीली ने नहीं उठाया, किन्तु यह बहुत ही प्रासंगिक प्रश्न है। वे कौन से लोग थे जो ईस्ट इंडिया कम्पनी की फौज में भर्ती हुए और भारत जीतने में अंग्रेजों की मदद की। मैं तो उत्तर दे सकता हूँ और जो काफी अध्ययन पर आधारित है, वह यह है कि ईस्ट इंडिया कम्पनी की फौज में भारत के अछूत भर्ती हुए। प्लासी की लड़ाई में जो लोग क्लाइव की ओर से लड़े, वे दुशाध थे और दुशाध अछूत थे। वे लोग जो कोरेगाँव में लड़े, वे महार थे और महार भी अछूत हैं। इस प्रकार पहली लड़ाई और अन्तिम लड़ाई में अंग्रेजों के पक्ष में जो लोग लड़े और भारत जीतने में उनकी सहायता की, वे अछूत थे। यह सत्य मारक्वेस ट्वीडल ने पील आयोग को जिसका गठन 1859 के लिए किया गया था भेजे गये अपने नोट में स्वीकार किया है। उन्होंने यह कहा हैµ (उद्धरण पांडुलिपि में नहीं दिया गया है µसंपादक) बहुत से ऐसे लोग हैं, जो अछूतों के अंग्रेजी फौजों में भर्ती होने के आचरण को विश्वासघात मानते हैं। जो भी हो। अछूतों का यह आचरण स्वाभाविक ही था। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जो यह दिखाते हैं कि कैसे एक देश में एक वर्ग के लोगों ने हमलावर के प्रति इस आशा से सहानुभूति दिखाई कि नया आने वाला उन्हें अपने देशवासियों के अत्याचारों से बचाएगा। जो अछूतों पर आरोप लगाते हैं उन्हें इंग्लिश लेबरिंग क्लासेस 17 में, अंग्रेजी मजदूर वर्गों द्वारा जारी किया गया निम्नलिखित घोषित पत्र पढ़ना चाहिए। (अधूरा छोड़ दिया गया हैः सारांश भी पांडुलिपि में नहीं है µसंपादक)
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क्या अछूतों का यह व्यवहार किसी प्रकार अनूठा था? आखिरकार अंग्रेज मजदूरों पर जितने जुल्म होते थे अछूतों पर उनकी तुलना में बहुत अधिक जुल्म होते थे और यदि अंग्रेजी मजदूरों के पास विदेशी हमलावर का स्वागत करने का एक कारण था तो अछूतों के पास सौ कारण थे। (पांडुलिपि में खाली स्थान छोड़ दिया गया है µसंपादक)
अछूतों ने अंग्रेजों को भारत जीतने में ही सहायता नहीं की, अपितु इसे अपने पास रखने में भी सहायता की। 1857 का विद्रोह अंग्रेजों के राज्य को उखाड़ फेंकने की
- सीली, एक्सपेंशन ऑफ इंग्लैंड, पृष्ठ 200-202