74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
सुविधा को ही तरजीह देते हैं, अछूतों को सेना से बहिष्कृत करके समस्या का समाधान कर दिया। उन्होंने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि वे उनके प्रति कृतज्ञ हैं।
इस बहिष्कार के जो भी कारण रहे हों, बहिष्कार का प्रभाव भी औचित्यपूर्ण हो, तथ्य यह है कि इस बहिष्कार का प्रभाव अछूतों के सामाजिक जीवन के लिए बहुत घातक रहा। सैनिक सेवा ही ऐसी सेवा थी जिसमें अछूत अपनी आजीविका कमा सकते थे और अपना भविष्य बना सकते थे। इतिहास इस बात का साक्षी है कि बहुत से अछूतों ने सेना में सराहनीय सेवा की और सैकड़ों अछूत जमादार सूबेदार और सूबेदार मेजर के पदों तक पहुँचे। सेना में होने से हिन्दू उनको आदर देने लगे और सत्ता, प्रतिष्ठा तथा प्रभाव के पदों पर होने से वे अपने आपको प्रभावशाली समझने लगे। फौज में 150 वर्ष तक काम करने के पश्चात अछूत इसे अपना पारम्परिक पेशा समझने लगे थे और उन्होंने किसी अन्य पेशे के योग्य बनने की चिन्ता नहीं की थी। पर 1890 में इनसे कहा गया कि उनकी आवश्यकता फौज में नहीं है। पर उन्हें नये हालात के अनुरूप अपने आप को ढालने का अवसर नहीं दिया गया, जैसा कि 1935 में एंग्लोµभारतीयों के मामले में किया था। जब यह सेवा बन्द हो गयी तो अछूतों को जबर्दस्त धक्का लगा और इस धक्के से वे अभी तक नहीं उभर पाए हैं। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि पहाड़ की चोटी से नीचे फेंक दिये गये और देशी सरकार के समय जिस तरह स्तर पर थे उससे भी नीचे गिरे।
अछूतों की सैनिक सेवा में भर्ती के बारे में इतना ही कहना है। पर असैनिक सेवा (या सिविल सेवा) में उनकी भर्ती के सम्बन्ध में क्या स्थिति है?
सिविल सेवा भर्ती के लिए आवश्यक है कि प्रार्थी काफी शिक्षित हो। केवल विश्वविद्यालय की डिग्री वाले लोग ही उसमें भर्ती हो सकते थे। अछूत भारत की जनता में सबसे कम पढ़े लिखे लोग रहे हैं। सिविल सेवा वास्तव में उनके लिए बन्द कर दी गयी थी। यह अभी हाल ही में उनमें से कुछ लोगों ने विश्वविद्यालय की डिग्री प्राप्त कर ली है, उनकी तकदीर कैसी रही? यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि वे दर-दर भीख माँग रहे हैं। सिविल सेवाओं में प्रवेश पाने में उनके सामने दो कठिनाइयाँ आयी हैं। पहली यह कि अंग्रेज सरकार ने उन्हें कोई वरीयता देने से इंकार कर दिया, यही नहीं अंग्रेज सरकार न उन सम्प्रदायों को जिनका सिविल सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं था, वरीयता देने का सिद्धान्त स्वीकार नहीं किया। उदाहरण के तौर पर अंग्रेज सरकार ने यह अवश्य माना है कि मुसलमानों को वरीयता दी जानी चाहिए यदि उनके पास न्यूनतम योग्यता है। उनके मामले में इस सिद्धान्त पर अमल किया गया है यह बात इस तथ्य से स्पष्ट हो जाती है कि भारत सरकार को नामांकन के आधार पर आई.सी.एस. के कतिपय पदों को भरने की जब से शक्ति मिली है, तब से सरकार ने आई.सी.एस. के पदों पर मुसलमानों को मनोनीत किया है। अंग्रेज सरकार ने एक भी उम्मीदवार अछूतों में से मनोनीत नहीं किया