अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 90

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यद्यपि ऐसे बहुत से अछूत थे जो न्यूनतम योग्यता की कसौटी को पूरा करते थे।

दूसरा कारण, जिसकी वजह से अछूत शिक्षा की दृष्टि से योग्य होने पर भी सिविल सेवाओं में स्थान नहीं पा सके यह है कि इन सेवाओं के लिए चुनाव की पद्धति है। अंग्रेजों के राज्य में खाली पदों को भरने का अधिकार विभागाध्यक्ष को होता था। विभागाध्यक्ष सवर्ण हिन्दू रहे हैं और आगे भी रहेंगे। एक सवर्ण हिन्दू अपने स्वभाव से ही एक अछूत उम्मीदवार का कोई लिहाज नहीं रख सकता। वह एक ऐसा व्यक्ति है जिसमें सहानुभूति बहुत होती है और वैर भाव भी बहुत होता है। उसकी सहानुभूति की भावना उसे पहले अपने परिवार, फिर अपने रिश्तेदार, फिर अपने मित्रों और फिर अपनी जाति के लोगों का ध्यान रखने के लिए प्रेरित करती है। इस बड़े क्षेत्र में से उसे खाली स्थान के लिए उम्मीदवार अवश्य मिल जाएगा। ख्1, ऐसा विरले ही होता है कि उसे अपनी जाति की सीमा के बाहर जाना पड़े। यदि वह ऐसा करता है तो अछूतों को तभी नौकरी मिलेगी, जब कोई सवर्ण हिन्दू प्रतिस्पर्धा करने के लिए नहीं होगा। यदि सवर्ण जाति का कोई भी प्रतिस्पर्धी है तो अछूत को कोई अवसर नहीं मिलेगा। इस प्रकार सिविल सेवा में भर्ती के मामले में अछूत पर हमेशा सब के बाद विचार किया जाता है। चूँकि उस पर अन्त में विचार किया जाता है, उसे अवसर मिलने की बहुत कम सम्भावना होती है।

दो ऐसी सेवाएँ हैं, जिनके लिए अछूत विशेष रूप से उपयुक्त हैं। एक है पुलिस सेवा और दूसरी सरकारी कार्यालयों में दासोचित सेवा। पुलिस सेवा के सम्बन्ध में अछूतों की स्थिति क्या है?

17 दिसम्बर, 1925 को संयुक्त प्रांत की विधान परिषद में एक प्रस्ताव रखा गया जिसमें सरकारी सेवा में विशेष रूप से पुलिस सेवा में अछूतों की भर्ती पर लगे सभी प्रतिबन्धों को हटाने का सरकार से अनुरोध किया गया। विभाग के प्रभारी ने सरकार की ओर से उत्तर देते हुए कहा, फ्नहीं, यदि आदरणीय सदस्य इसे सबके लिए खुला रखना चाहते हैं, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन इस समय पुलिस बल में आपराधिक समुदाय या नीच जाति के किसी व्यक्ति जैसे चमार की भर्ती का अवश्य विरोध करूँगा।य्

22 जुलाई, 1927 को लाला मोहनलाल ने पंजाब विधानसभा में निम्नलिखित प्रश्न पूछाः

लाला मोहनलाल µ फ्क्या वित्त मन्त्री यह बताने की कृपा करेंगे कि दलित वर्गों के सदस्यों की पुलिस में भर्ती की जाती है? यदि नहीं तो क्या सरकार यह निर्देश देने का इरादा रखती है कि पुलिस कांस्टेबलों की भर्ती के मामले में दलित जातियों के लोगों को भी लिया जाएगा।य्

  1. यह वह सिद्धान्त है, जिसके अनुसार पद भरे जाते हैं और इसे सब जानते हैं। वस्तुतः यह इतना स्थापित

है कि यदि किसी को विभागाध्यक्ष की जाति पता है, तो वह उस विभाग के कर्मचारी की जाति भी

बता देगा।