अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 91

76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

माननीय सर जाफरी दि मोटंमोरेंसी µ फ्दलित लोगों की पुलिस में भर्ती नहीं की जाती है। जब इस बात का सबूत मिल जाएगा कि समाज के सभी वर्गों के समान दलित वर्गों के साथ व्यवहार होता है, (जो शायद कमायत तक नहीं होगा) या सरकार का यह समाधान हो जाता है कि इन वर्गों की भर्ती से पुलिस बल की कार्यकुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा और इन लोगों की भर्ती करना सेवा के हित में होगा तो सरकार उन लोगों को इस सेवा में भर्ती की छूट दे देगी, बशर्ते कि वे इस सेवा में भर्ती के लिए अपेक्षित शारीरिक तथा अन्य मानकों को पूरा करते हों।य्

इस प्रश्न पर विचार करने के लिए 1928 में सरकार द्वारा नियुक्त समिति ने निम्नलिखित रिपोर्ट दी। (उद्धरण पांडुलिपि में नहीं है)।

अतः जहाँ तक दासोचित सेवा का सम्बन्ध है यह भी उनके लिए बन्द है। बहुत कम इस पर विश्वास करेंगे यद्यपि यह सही है और बहुत कम इसके कारण जानते होंगे यद्यपि यह बिल्कुल स्पष्ट है। एक अछूत को दासोचित सेवा में उसी कारण नहीं लिया जाता है जिस कारण उसे पुलिस सेवा में नहीं लिया जाता है। यह है अस्पृश्यता। एक आदमी की गिरफतारी करना एक सिपाही का कर्तव्य है। उदाहरण के तौर पर तलाशी वारंट तामील करने के लिए किसी के घर में प्रवेश करना एक सिपाही की ड्यूटी है। यदि गिरफतार किया गया व्यक्ति हिन्दू हो और सिपाही अछूत तो क्या होगा? पुलिस के सिपाहियों को आस-पड़ोस में रहना पड़ता है और एक ही नल का इस्तेमाल करना पड़ता है। एक हिन्दू की क्या प्रतिक्रिया होगी यदि एक अछूत सिपाही पड़ोसी है? उन बातों के आधार पर पुलिस सेवा में अछूतों की भर्ती पर रोक लगा दी गयी है। दासोचित सेवा के मामले में भी यही बात लागू होती है। सरकारी कार्यालय में काम करने वाले एक नौकर को कार्यालय में नौकरी करनी होती है। लेकिन अपनी नौकरी के कारण वह दूसरों के सम्पर्क में आता है जो हिन्दू होते हैं। उसके सम्पर्क से प्रदूषण होता है। उसका स्वागत कैसे हो सकता है? इसके अतिरिक्त परम्परा के अनुसार कार्यालय में एक चपरासी से अधिकारी का दफतर और घर का काम करने की अपेक्षा की जाती है। उसे अपने स्वामी के लिए चाय लानी होती है, घर में मालिक की पत्नी के लिए बाजार से सामान लाना होता है और उसे बच्चों की देखभाल भी करनी होती है। दासोचित पदों पर अछूतों की नियुक्ति हो जाये तो अधिकारी को इन सेवाओं से वंचित रहना पड़ता है। इन सेवाओं से वंचित होने के बजाय अछूतों को सेवा देने के अधिकार से वंचित कर दिया जाता था। इस प्रकार किसी भी अछूत की भर्ती नहीं की जाती थी। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए बम्बई समिति को इस सम्बन्ध में एक विशेष सिफारिश करनी पड़ी।

तीन

अंग्रेज सरकार ने अछूतों की शिक्षा के लिए क्या किया? मैं बम्बई प्रेसीडेंसी को एक उदाहरण के तौर पर लूँगा। जहाँ तक शिक्षा का सम्बन्ध है, अंग्रेज प्रशासन की अवधि को तीन सुविधाजनक अवधियों में बाँटा जा सकता है।