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I (1813 से 1854)
- बम्बई प्रेसीडेंसी में शिक्षा का आरम्भ 1815 में अंग्रेजी राज में बम्बई एजूकेशन सोसायटी की स्थापना से हुआ। इस सोसायटी ने अपना कार्य यूरोपीयन बच्चों की शिक्षा तक सीमित नहीं रखा। देशी बच्चों को सूरत और थाणे में स्कूल में जाने के लिए उत्साहित किया गया और 1820 के आरम्भ में देशी बच्चों के लिए बम्बई में चार अलग स्कूल
खोले गये जिनमें लगभग 250 बच्चे जाते थे। उसी वर्ष अगस्त में मूल निवासियों की शिक्षा के लिए और भी उपाय किये गये। सोसायटी ने देशी भाषा में स्कूली पुस्तकें तैयार करने और देशी विद्यालय स्थापित करने या स्थापित करने में मदद करने के लिए एक विशेष समिति का गठन किया। लेकिन शीघ्र ही देखा गया कि इतना व्यापक क्षेत्राधिकारी, मुख्य रूप से गरीबों की शिक्षा के लिए नियुक्त सोसायटी के उद्देश्यों के बाहर है और 1822 में समिति एक पृथक निगम बन गयी जिसका नाम था µ फ्बॉम्बे नेटिव स्कूल बुक एंड स्कूल सोसायटीय् जिसे 1827 में बदल कर बॉम्बे नेटिव एजूकेशन सोसायटी कर दिया गया। माननीय माउंट स्टूअर्ट एलफिंस्टन इस नयी सोसायटी के प्रथम अध्यक्ष थे। उपाध्यक्ष थे मुख्य न्यायाधीश और बम्बई सरकार की कार्यकारिणी परिषद के तीन सदस्य। प्रबन्ध समिति में 12 यूरोपीय थे और 12 देशी लोग थे। कप्तान जार्ज जरविश आर.ई. तथा श्री सदाशिव काशीनाथ छत्रे उसके सचिव थे। सोसायटी ने सरकार से 600 रुपये प्रतिमाह के अनुदान से कार्य आरम्भ किया। 1825 में बम्बई सरकार ने अपने खर्चे पर जिला कस्बों में अपने प्राथमिक विद्यालय स्थापित करना आरम्भ कर दिया, जिनका नियन्त्रण जिलाधीश के अधीन था। इन दो स्वतन्त्र संस्थाओं के कार्यों में तालमेल बिठाने के लिए 1840 में एक बोर्ड ऑफ एजूकेशन बनाया गया, जिसमें 6 सदस्य थे। उनमें से तीन सरकार द्वारा नियुक्त किये गये और तीन नेटिव एजूकेशन सोसायटी द्वारा नियुक्त किये गये। बोर्ड, 1855 में डायरेक्टर ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन की नियुक्ति तक उस विभाग का इंचार्ज रहा।
- पहली मार्च 1855 को जब बोर्ड समाप्त कर दिया गया, तब बम्बई प्रेसीडेंसी में बोर्ड के चार्ज में 15 अंग्रेजी कॉलेज तथा विद्यालय थे, जिनमें 2850 छात्र नामांकित थे और 256 देशी स्कूल थे, जिनमें 18883 छात्र नामांकित थे। उसी रिपोर्ट में बोर्ड ने कहा हैµ
फ्24 अगस्त, 1855 में हमें अहमद नगर के नागरिकों से एक पत्र नीच जातियों की शिक्षा के लिए एक स्कूल स्थापित करने और उसके अध्यापकों को आधा वेतन देने का अनुरोध किया गया था। नवीनतम नियम के अनुसार आवेदन कर्ताओं द्वारा एक कमरा बनवाया गया था और छात्रों की संख्या 30 थी। ऐसे स्कूल का स्थापना का विरोध पूँजीपतियों व उच्च जाति द्वारा किया गया था और कम वेतन पर अध्यापक ढूँढ़ना भी कठिन था, किन्तु आवेदन नवीनतम नियमों के अनुकूल होने के कारण, हमने अनुरोध तुरन्त स्वीकार कर लिया और स्कूल नवम्बर में खुल गया। हम इस विषय का उल्लेख इसलिए करते हैं कि यह पहला अवसर था कि हमने इन जातियों के लिए स्कूल खोला।य्