78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
बोर्ड के इस बयान से कि यह पहला अवसर था कि नीच जातियों के लिए बम्बई प्रेसीडेंसी में एक स्कूल की स्थापना हुई, यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि 1855 से पूर्व दलितों की शिक्षा के सम्बन्ध में ब्रिटिश सरकार की क्या नीति थी? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए यह आवश्यक है कि 1813µ1855 के बीच, बम्बई प्रेसीडेंसी में अंग्रेजी सरकार की शिक्षा नीति का गहराई से अध्ययन किया जाए। यह स्वीकार करना होगा कि पेशवा के शासनकाल में अछूत वर्गों को शिक्षा नहीं दी जाती थी। उनको शिक्षा के क्षेत्र में कोई स्थान नहीं मिला। इसका कारण यह था कि पेशवा की सरकार मनु के सिद्धान्तों पर आधारित एक धर्मतन्त्र थी, जिसके अनुसार शूद्रों व अतिशूद्रों को जीवन, स्वतन्त्रता तथा सम्पत्ति का अधिकार प्राप्त होते हुए भी शिक्षा का कोई निश्चित अधिकार प्राप्त नहीं था। अछूत वर्गों ने जो इन अयोग्यताओं में पिस रहे थे, उस घृणित धर्मतन्त्र के पतन पर स्वाभाविक रूप से राहत की साँस ली। अंग्रेजी शासन आने से दलित वर्गों में आशा की एक किरण का उदय हुआ था। इसका पहला कारण तो यह था कि यह एक लोकतन्त्र था जिसमें कि उनके अनुसार सभी लोगों को समान अधिकार प्राप्त होते हैं। यदि इसके सिद्धान्तों का पालन किया गया, तो इस प्रकार का प्रजातन्त्र पेशवा के धर्मतन्त्र के पूर्णतः प्रतिकूल होगा। दूसरे, दलितों ने अंग्रेजों को देश जीतने में सहायता की थी और स्वभावतः उनका विश्वास था कि अंग्रेज भी अपनी बारी में उनकी सहायता करेंगे।
अंग्रेज बहुत दिनों तक तो देशवासियों में शिक्षा के प्रसार के मामले में चुपचाप रहे। यद्यपि भारत के प्रशासन में उच्च अधिकारी भारत के लोगों के बीच शिक्षा के मामले में अपने नैतिक कर्तव्यों और प्रशासनिक आवश्यकता को भूले नहीं थे। 1813 तक इस सम्बन्ध में राज्य की जिम्मेवारी के बारे में सार्वजनिक रूप से कोई घोषणा नहीं की गयी। जब संविधान की धारा 43 द्वारा संसद ने नियम बनाया कि फ्भारत की मालगुजारी की बचत का कम-से-कम एक लाख रुपया प्रति वर्ष अलग रख दिया जाये और इसे साहित्य के पुनरुत्थान और भारत के पढ़े-लिखे लोगों को उत्साहित करने तथा भारत में अंग्रेजी राज्यक्षेत्रों के निवासियों में विज्ञान की शिक्षा आरम्भ करने तथा उसे बढ़ावा देने पर खर्च किया जाये।य् तथापि इस कानूनी व्यवस्था के बावजूद भारत के मूल निवासियों की शिक्षा को ठोस व संगठित आधार प्रदान करने के लिए 1823 तक कोई नियमित प्रयास नहीं किये गये। 1813 के कानून की धारा 43 को प्रभावी करने की नीति निर्धारित करने के सम्बन्ध में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने अपने 3 जून, 1814 के डिस्पैच में गवर्नर जनरल इन काउंसिल को निर्देश दिया कि हिन्दुओं को संस्कृत पढ़ाने से वे उद्देश्य पूरे हो जाएँगे जो संसद के दिमाग में थे। लेकिन दलित वर्गों को कितनी निराशा हुई जब मूल निवासियों की शिक्षा को ठोस और संगठित आधार प्रदान करने के लिए नियमित प्रयास किये गये और अंग्रेजी सरकार ने जानबूझ कर निर्णय दिया कि शिक्षा