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उच्च जातियों के लिए सुरक्षित है। इस तथ्य को कपोल-कथा नहीं माना जाये इसलिए बम्बई प्रेसीडेंसी के बोर्ड ऑफ एजुकेशन की वर्ष 1850-51 की रिपोर्ट के निम्नलिखित उद्धरणों की ओर ध्यान आकर्षित किया जाता हैµ
फ्पाँचवा पैराग्राफः बोर्ड द्वारा अपनाई गयी पद्धति कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के विचारों पर आधारित थी। इस प्रकार इस प्रेसीडेंसी के शिक्षा बोर्ड द्वारा माननीय कोर्ट के मुख्य आदेशों के अनुसार शिक्षा पद्धति निर्धारित कर दिये जाने और आर्ल ऑफ आकलैंड, मेजर कैंडी तथा अन्य, जैसे भारत में शिक्षा की प्रगति पर सावधानी से विचार करने वाले लोगों के मत और विवेकशील मूल निवासियों की खुले आम घोषित माँगों के आधार पर शिक्षा आरम्भ हो जाने पर कौंसिल में पूर्ववर्ती लार्डशिप ने बोर्ड को सूचित किया कि यह प्रक्रिया उलट दी जाय।य्
फ्चौदहवाँ पैराग्राफः निष्कर्ष कि आम जनता को शिक्षित करने के लिए साधन उपलब्ध नहीं हैं। इन तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है कि यदि 175 देशी विद्यालयों को सुव्यवस्थित करने और 10730 छात्रों को आरम्भिक शिक्षा देने के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं है, तो 14 करोड़ आम जनता को जिसमें बम्बई प्रेसीडेंसी के 90,0000 छात्र भी शामिल हैं, को शिक्षित करने का प्रयास नहीं रहता। यह लक्ष्य ऐसा नहीं है जो सरकार प्राप्त कर सके या उसके निकट पहुँच सके अतः शिक्षा बोर्डों को उपकार के अपेक्षाकृत सीमित और व्यावहारिक क्षेत्र से विमुख नहीं होना चाहिए।य्
फ्पंद्रहवाँ पैराग्राफः सीमित साधनों से अच्छे परिणाम दिखाने के बारे में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के विचार µ माननीय कोर्ट ने पिछले पैराग्राफ में निकाले गये निष्कर्ष का हमेशा निश्चित रूप से ध्यान रखा है। यह महसूस करते हुए कि लोगों को शिक्षित करने के लिए बहुत कम प्रयास किये जा सकते हैं, उन्होंने सीमित साधनों से अच्छे से अच्छे परिणाम दिखाने के सही तरीके के बारे में अपनी विभिन्न सरकारों को बताना आवश्यक समझा है। हम इस आशय के सरकार को दिये गये आदेश का पहले उल्लेख कर चुके हैं और उसी तारीख को सरकार को विज्ञप्ति दी गयी। इससे एक ही भाव की पुष्टि होती हैµ फ्हमारी यह तीव्र आकांक्षा है कि भारत के उच्च श्रेणी के मूल निवासियों को यूरोपीय विज्ञानों की शिक्षा दी जाये और सभ्य यूरोप का साहित्य उपलब्ध कराया जाय। उच्च वर्गों के लोगों के चरित्र तथा प्राकृतिक प्रभाव से अन्ततः जनसाधारण के चरित्र का निर्माण होता है।य्
फ्सोलहवाँ पैराग्राफः भारत के उच्च वर्गों की जाँच µ यह स्पष्ट हो जाने पर कि भारत में सरकार बहुत कम लोगों को शिक्षा दे सकती है और माननीय कोर्ट द्वारा वास्तव में यह निर्णय ले लिये जाने पर, कि यह शिक्षा केवल उच्च वर्गों को ही दी जा सकती है, यह पता लगाना आवश्यक है कि उच्च वर्गों में कौन लोग आते हैं। इस सम्बन्ध में यह आवश्यक है कि यूरोपीय जाँचकर्ता, यूरोप के लोगों की भारत के लोगों