अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 95

80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

से तुलना न करें जो अपने आप को प्रायः आँग्ल भारतीय मानते हैं। यूरोप में विशेष रूप से इंग्लैंड में परिस्थितियों के कारण व्यवहार, धन, राजनैतिक और सामाजिक प्रभाव की दृष्टि से उच्च और निम्न वर्गों में अन्तर स्पष्ट दिखाई देता है। भारत में ऐसा कोई अन्तर नहीं है। हर तानाशाही की तरह भारत में भी यदि राजा चाहे तो वह रंक को राजा बना सकता था। यह कारण है कि भारत में व्यवहार की दृष्टि से सभी लोग बराबर थे। अंग्रेजों की धारणा है कि एक भिखारी पशु के बराबर है और वह दरिद्रालय में ही शोभा बढ़ा सकता है, लेकिन भारत में वह एक प्रतिष्ठित व्यक्ति है और ब्राह्मणवादी सिद्धान्त के अनुसार पूजनीय है क्योंकि वह एक ऐसा व्यक्ति है जिसने ज्ञान प्राप्त करने और देवता की निर्विघ्न पूजा करने के लिए जीवन के सभी सुख साधनों को त्याग दिया है।य्

फ्सत्रहवाँ पैराग्राफः भारत में उच्च वर्ग µ भारत में जिन वर्गों को प्रभावशाली और उच्च वर्ग समझा जा सकता है वे इस प्रकार हैंµ

पहला µ जमींदार, और जागीरदार, पुराने सामन्तों के प्रतिनिधि, देशी राजाओं के अधिकारी और सिपाही।

दूसरा µ वे लोग जिन्होंने व्यापार अथवा वाणिज्य से धन प्राप्त कर लिया है अथवा व्यापारी वर्ग।

तीसरा µ सरकार के उच्च अधिकारी।

चौथा µ ब्राह्मण जिनमें उच्च जातियों के लेखकों को सम्मिलित किया जा सकता है यद्यपि वे काफी अन्तराल के बाद आये जिन्होंने लेखनी को अपनी आजीविका का साधन बनाया जैसे बम्बई में प्रभू और शैनविस। बंगाल में कायस्थ, बशर्ते वे पांडित्य अथवा व्यवस्था में कोई स्थान प्राप्त कर लेते हैॅं।य्

फ्अठारहवाँ पैराग्राफः ब्राह्मण अति प्रभावशाली µ उक्त चारों वर्गों में से परवर्ती वर्ग बहुत ही प्रभावशाली और अधिसंख्य है और इसे कुल मिलाकर सरकार द्वारा आसानी से प्रभावित किया जा सकता है। सम्पूर्ण भारत में यह माना हुआ तथ्य है कि प्राचीन जागीरादर या सिपाही वर्ग का स्तर प्रतिदिन हमारे राज्य में गिरता जा रहा है। उनका पुराना पेशा नहीं रहा और उन्हें नया पेशा अपनाने अथवा कला को बढ़ावा देने में कोई रुचि नहीं है। उनके उत्तराधिकारियों ने भूमि सम्पन्न अभिजात वर्ग को सम्भालने के प्रयास किये किन्तु वे बुरी तरह असफल रहे। सिपाही वर्ग को नागरिक सम्मान और शिक्षा के माध्यम से प्रतिष्ठा देने के सभी प्रयास अभी तक असफल रहे हैं और उन्हें केवल आडम्बर तथा उच्छृंखलता तथा हिन्दुस्तान के मैदानों में अपने पूर्वजों के सफल आक्रमणों की याद ही अच्छी लगती है। इसी प्रकार व्यापारी वर्ग को भी कुछ अपवादों को छोड़ कर उच्च शिक्षा देने में कोई रुचि नहीं है। यूरोप के अधिक सभ्य देशों को छोड़ कर अन्य सभी देशों की भाँति भारत में भी युवा व्यापारियों को अपनी स्कूली शिक्षा जल्दी