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छोड़ देनी होती है, ताकि वह अपने व्यवसाय के लिए आवश्यक विशेष शिक्षा प्राप्त कर सकें। अन्त में जहाँ तक सरकारी अधिकारियों का सम्बन्ध है यद्यपि सरकार के सम्पर्क में आने वाले लोगों पर उनका काफी प्रभाव होता है, उनका सरकार के सम्पर्क में न आने वाले बहुसंख्यक लोगों पर कोई प्रभाव नहीं होता और जनता उन पर सन्देह करती है और उनको भाड़े का टट्टू समझती है जैसा कि इंग्लैंड में होता है।य्
फ्उन्नीसवाँ पैराग्राफः ब्राह्मणों की गरीबी µ उपर्युक्त विश्लेषण यद्यपि लम्बा लगता है फिर भी अपरिहार्य है, क्योंकि इससे कुछ अपरिहार्य निष्कर्ष निकलते हैं। सबसे पहले यह प्रमाणित करता है कि प्रभावशाली वर्ग में जिसको सरकार शिक्षा का प्रसार करने के काम में लगा सकती है वह है ब्राह्मण तथा इनमें मिलती-जुलती अन्य उच्च जातियाँ आती हैं। लेकिन ब्राह्मण और इन उच्च जातियों के अधिकांश लोग काफी गरीब हैं और भारत के अनेक भागों में ब्राह्मण एक भिखारी का पर्यायवाची है।य्
फ्बीसवाँ पैराग्राफः धनवान वर्ग वर्तमान में उच्च शिक्षा का समर्थन नहीं करेंगे µ हम देखते हैं कि काउंसिल में लॉर्डशिप ने दिनांक 24 अप्रैल, 1850 के अपने पत्र में हमें जो आदेश दिया उसे लागू करना बहुत निराशाजनक है। धनी लोगों को, जो इसके लिए भुगतान कर सकते हैं तथा असामान्य बुद्धि के युवकों को ही शिक्षा देने का सिद्धान्त ऊपर से देखने पर तो युक्तिसंगत और सही प्रतीत होता है लेकिन वास्तव में बोर्ड ने बार-बार प्रयास करके देख लिया है और उसे अनिवार्य रूप से हमेशा यह उत्तर मिला है कि धनी व्यक्ति पूर्णतः उच्च शिक्षा के प्रति उदासीन है और गरीबों में असामान्य बुद्धि का तब तक पता नहीं लगाया जा सकता जब तक कि स्कूली शिक्षा से उनकी मानसिक शक्ति की जाँच न कर ली जाये और उसे विकसित न कर लिया जाये। धनवानों में से कुछ लोगों को जो उच्च शिक्षा के लाभ को पहचानते हैं, निस्सन्देह यह मानते हैं कि उच्च शिक्षा लाभप्रद है। बंगाल में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है, जहाँ सरकार शिक्षा को काफी समय से बढ़ावा दे रही है। बम्बई में ऐसे लोगों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। हम इस वर्ग में वृद्धि अनिवार्य समझते हैं, क्योंकि हमारा अनुभव है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करके समानता के आधार पर सम्बन्ध स्थापित करना सम्भव होगा। लेकिन फिलहाल सामान्यतः हम मानते हैं कि यूरोप की कला तथा विज्ञान में उच्च शिक्षा छात्रों से अंशदान लेकर या भारत के धनी लोगों से पैसा लेकर नहीं दी जा सकती।य्
फ्इक्कीसवाँ पैराग्राफः निम्न जातियों को शिक्षित करने का प्रश्नµ कई वर्णों के अनुभव से हमारे सामने जो तथ्य आये हैं उनसे यही व्यावहारिक निष्कर्ष निकलता है कि उच्च जातियों के गरीब लोगों के बच्चों के लिए जो हमसे शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक हैं, शिक्षा संस्थानों के द्वार खोल दिये जाने चाहिए। लेकिन जहाँ पुनः एक कठिन प्रश्न उठता है और वह यह है कि यदि गरीब बच्चों को सरकारी संस्थाओं में निर्बाध रूप से दाखिल किया जाता है तो ढेड़, महार आदि उपेक्षित जातियों के बच्चों को इन