अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 97

82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

संस्थाओं में आने से क्यों रोका जाये?य्

फ्बाइसवाँ पैराग्राफः हिंदुओं का सामाजिक पक्षपात µ सोचने की बात यह है कि यदि उपेक्षित बच्चों की कोई कक्षा बम्बई में बनाई गई, तो उन्हें समाज के अन्य लोगों की तरह उच्च बुद्धि के व्यक्ति बनाने के लिए बोर्ड के अन्तर्गत सेवा करने वाले प्रोफेसरों और अध्यापकों के प्रभाव में शिक्षित करना होगा और ऐसा करने पर वे अपेक्षित योग्यताएँ प्राप्त कर लेंगे और ऐसी स्थिति में उन्हें देशी प्रतिभावान व्यक्तियों के लिए

खुले न्यायाधीश, ज्यूरी आदि के उच्चतम पदों की आकांक्षा करने से कोई नहीं रोक सकेगा। कुछ परोपकारी लोग सोचते हैं कि इन देशों के वशीभूत होना ब्रिटिश सरकार की अशिष्टता और कमजोरी की पराकाष्ठा होगी क्योंकि ऐसी नियुक्तियों से हिन्दू समाज में घृणा पैदा होगी। इसलिए अच्छा यह होगा कि जाति के बन्धनों को तोड़ा जाये।

फ्तेईसवाँ पैराग्राफः माननीय माउंट स्टूअर्ट एलफिन्स्टन के विवेकपूर्ण कथनों से उद्धरण µ लेकिन बहुत ही उदार और विशाल मन वाले प्रशासक श्री एलफिन्स्टन की जो भारत का पक्षधर था, विवेकपूर्ण टिप्पणियों से सही कार्य-विधि का पता चलता है। उन्होंने कहा है, फ्यह देखने में आता है कि धर्म प्रचारकों को निम्नतम जातियों के बच्चे अच्छे लगते हैं। लेकिन हमें इन वर्गों के लोगों को प्रोत्साहन देने के मामले में काफी सावधानी बरतनी चाहिए। वे सब से अधिक उपेक्षित ही नहीं है, अपितु समाज में गिनती के हिसाब से बहुत कम हैं। इसलिए इस बात की आशंका है कि हमारी शिक्षा पद्धति की जड़ें उनमें फैल गयीं तो आगे नहीं बढ़ेंगी। और हम एक नये वर्ग के ऊपर बैठे होंगे जो उपयोगी ज्ञान में अन्य लोगों से आगे होंगे। लेकिन उन जातियों की आँखों में घृणा के पात्र होंगे जिनको ऐसी शिक्षा मिलनी चाहिए। यदि हम अपनी सेना अथवा कुछ लोगों के बल पर अपनी सत्ता चलाना चाहते हैं, लेकिन इसे व्यापक आधार देने का प्रयास नहीं करते, तो यह असंगत होगा।य्

  1. अतः यह स्पष्ट है कि यदि 1855 से पूर्व बम्बई प्रेसीडेंसी में अछूतों के लिए कोई स्कूल नहीं खोले गये थे तो इसका कारण यह था कि अंग्रेज सरकार चाहती थी कि शिक्षा का लाभ गरीब उच्च वर्गों, विशेष रूप से ब्राह्मणों को पहुँचाया जाये। यह नीति ठीक थी या गलत, यह दूसरा प्रश्न है। तथापि तथ्य यह है कि इस अवधि के दौरान सरकार ने दलित जातियों को शिक्षा के वरदान में भागीदार नहीं बनने दिया।

II (1854 से 1882)

  1. कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने अपने डिस्पैच संख्या 49 दिनांक 19 जुलाई, 1854 में निम्नलिखित टिप्पणी कीµ फ्यदि सम्भव हो तो अब हमारा ध्यान उस विषय पर विचार करने पर जाना चाहिए जो ज्यादा महत्त्वपूर्ण है और हम यह स्वीकार करते हैं कि इसकी अब तक बहुत अपेक्षा की गयी है अर्थात जीवन के हर मुकाम के लिए उपयुक्त, उपयोगी