84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
(अ) यदि ग्राह्य धारा 32 के अंतर्गत सुसंगत है।
(ब) यदि ग्राह्य मनोदशा या शरीर से संबंधित है समय पर किया गया और आचरण
के साथ चलता है।
(स) यदि ग्राह्य सुसंगत है तो वह ग्राह्य है।
दृष्टांतः- (द) और (इ)
धारा 23
(2) इन तीन मामलों को छोड़कर, एक ग्राह्य, यदि उसे प्रमाणित करना है तो केवल एक पक्ष के विरुद्ध प्रमाणित किया जा सकता है। किंतु एक मामला है जिसमें प्रमाण नहीं दिया जा सकता है। यह एक मामला जहां ग्राह्य स्पष्ट शर्त पर किया गया था कि ग्राह्य का प्रमाण नहीं दिया जाएगा।
धारा 31
(3) जो मामले दाखिल हो चुके हैं उनका दाखिल हो जाना एक निश्चायक प्रमाण नहीं है। एक ग्रहण एक विबंधन हो सकता है यदि विबंधन के लिए आवश्यक तत्त्व विद्यमान है जिस मामले में एक पक्ष जिसके विरुद्ध वह प्रमाणित करने हेतु चाहा जाता है, उसे अप्रमाणित करने या उसे व्याख्यायित करने के लिए साक्ष्य नहीं दे सकता है। किंतु यदि वह एक पक्ष द्वारा एक विबंधन नहीं है, जिसके विरुद्ध वह प्रमाणित किया जाता है, उसे अप्रमाणित करने या उसकी व्याख्या करने के लिए साक्ष्य दिया जा सकता है।
- ग्रहण केवल उस पक्ष के विरुद्ध प्रमाणित किए जाते हैं जो उनको करता है किंतु वे हित में उसके प्रतिनिधि के भी विरुद्ध प्रमाणित किए जाते हैं।
हित में एक प्रतिनिधि कौन है?
(i) अधिनियम में इस पारिभाषिक शब्द की कोई परिभाषा नहीं है।
(ii) यह विधिक प्रतिनिधि जो दंड संहिता के अनुसार एक व्यक्ति जो मृतक
व्यक्ति की संपदा का विधि में प्रतिनिधित्व करता है, से बहुत बड़ा माना
जाता है।
(iii) वह न केवल विधिक प्रतिनिधि को अंतर्विष्ट करता है वरन् एक व्यक्ति
के संबंधियों को भी अंतर्विष्ट करता है।
(iv) एक व्यक्ति के संबंधी हैंः-
(i) रक्त-संबंधी जैसे कि पूर्वज एवं उत्तराधिकारी।
(ii) विधिक संबंधी, जैसे कि एक वसीयत-कर्ता का निष्पादक या एक
अवसीयत का प्रशासक।
(iii) संपदा या हित में संबंधी, जैसे कि विक्रेता एवं क्रेता
अनुदाता एवं अनुदानिति, दाता एवं आदाती, पट्टठ्ठाकर्ता एवं अधिभारी ताकि एक