96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
अधिकार रखता है।
- भार एक कब्जा-निषेध भार है अर्थात् यह कब्जा रोके रखने का अधिकार नहीं
देता है। चूंकि दायित्व दिया जा चुका है, भार विक्रेता को कब्जे को अस्वीकार
करने का अधिकार नहीं देता - 30 मद्रास 524, 43 मद्रास 712, 23 बम्बई 525,
34 मद्रास 543
- संपत्ति पर भार होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, यदि कई क्रेता हैं, जो आपस में
एक निश्चित अनुपात में अदा करने को सहमत हो गए हैं।
- असंदत्त मूल्य के लिए भार के लिए दावा, न केवल भूल करेगा को बनाता है
वरन् यह बिना प्रतिफल हस्तांतरिती या असंदाय की सूचना के साथ हस्तांतरिती
को भी उपलब्ध है।
- भार केवल क्रयधन के लिए ही नहीं वरन् क्रय-धन पर ब्याज के लिए भी होता
है।
- ब्याज के लिए भार का अधिकार केवल उस दिनांक से आरम्भ होता है जिस दिन
से कब्जा प्रदान कर दिया गया है। संपत्ति पर भार के प्रयोजनों के लिए ब्याज
शामिल करने का अधिकार कब्जा दिया जा चुकने से पूर्व, साम्याओं एवं वाद की
परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
दृष्टांतः-
यदि क्रेता, विक्रेता के लिए विल्लंगम उन्मोचन की प्रतिभूति के रूप में क्रय-धन का एक भाग रोके रखता है तो वह ब्याज के लिए दायी नहीं है।
- आंग्ल एवं भारतीय विधि।
(i) आंग्ल-विधि के अधीन विक्रेता का संविदा के दिनांक से धारणाधिकार होता है।
(ii) भारतीय विधि में भार हस्तांतरण के दिनांक से आरम्भ होता है।
(iii) इस अंतर के कारणः-
(अ) आंग्ल-विधि के अधीन, विक्रेता संविदा के परिणामस्वरूप संपत्ति से पृथक
हो जाता है।
(ब) भारतीय विधि के अधीन, विक्रेता हस्तांतरण के परिणामस्वरूप पृथक होता
है।
(स) परिणाम वही है, क्योंकि दोनों संपत्ति के विरुद्ध कार्यवाही का अधिकार प्रदान
करती है। एकमात्र अंतर यह है कि आंग्ल-धारणाधिकार साम्यिक होते हुए
साम्या द्वारा परिस्थितियों के अनुसार गढ़ा जा सकता है। जबकि भारतीय भार
सांविधिक होते हुए अनम्य है और निश्चित रूप से विधि के अनुरूप होना
चाहिए।