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- जहां तक संभव है, विक्रय विल्लंगमों से निश्चय ही मुक्त होना चाहिए। विल्लंगमों से मुक्त विक्रय प्रावधानित करने के लिए संपत्ति अंतरण अधिनियम में दो धाराएं हैं, जो इसे संभव करती है। वे धारा 56 एवं धारा 57 हैं।
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भाग - 1
बंधक की प्रकृति
I. परिभाषाः-
- धारा 58 परिभाषित करती है कि बंधक क्या है। धारा के अनुसार बंधक व्यवहार के तीन अवयव हैंः-
(i) हित का हस्तांतरण।
(ii) विशिष्ट अचल संपत्ति में।
(iii) एक ऋण के अपने अग्रिम धन की अदायगी सुनिश्चित करने के लिए।
II. इन अवयवों की व्याख्या -
(i) अचल संपत्ति बंधक का एक अनिवार्य अवयव नहीं हैः-
(1) आंग्ल विधि के अधीन सभी प्रकार की संपत्ति, चाहे वह पूर्णस्वामिक हो या वास्तविक, बंधक का विषय हो सकती है। वास्तविक संपदा मूर्त या अमूर्त हो सकती है और वैयक्तिक संपदा कब्जे में या कार्य में हो सकती है। संपदा पूर्ण या निर्धारणीय हो सकती है अर्थात् जीवन के लिए वह वैध अथवा साम्य हो सकती है। न केवल किसी भी प्रकार की संपत्ति बंधक की विषय वस्तु हो सकती है वरन् उसमें कोई हित बंधक किया जा सकता है चाहे ऐसा हित निहित, प्रत्याशित या आकस्मिक है।
(2) संपत्ति का हस्तांतरण बंधक के संबंध में केवल अचल संपत्ति को ही व्यक्त करता है। यह यही विचार देता है कि विधि चल संपत्ति के बंधक को मान्यता प्रदान नहीं करती है। यह एक गलती होगी। संपत्ति अंतरण अधिनियम केवल संपत्ति से संबंधित विधि को परिभाषित और संशोधित करता है। यह विधि को समेकित नहीं करता।
अतः वह बंधक से संबंधित पूर्ण एवं परिपूर्ण विधि नहीं है।
(3) चल संपत्तियों के बंधक भारत में मान्य हैं।
9 सी.डब्ल्यू.एन. 14, 8 बम्बई एस.आर. 344
(4) वह विधि जिसके द्वारा चल (संपत्तियों) के बंधक शासित होते हैं।
संपत्ति अंतरण अधिनियम कोई प्रावधान नहीं करताः भारतीय संविदा अधिनियम कोई प्रावधान नहीं करता, फलतः ऐसे बंधकों के संदर्भ में आंग्ल विधि के सिद्धांत