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(3) यदि यह शर्त विक्रय द्वारा बंधक है, तब -
(i) प्रति हस्तांतरण का अधिकार वैयक्तिक नहीं है वरन् निबंधन में अधिकार है और हस्तांतरिती के द्वारा निष्पादित किया जा सकता है।
(ii) यहां समय सार के रूप में नहीं माना जाएगा।
- वह क्या है जो प्रतिक्रय की शर्त के साथ विक्रय और सशर्त विक्रय द्वारा बंधक को भिन्न करता है?
(1) सशर्त विक्रय द्वारा बंधक में, संव्यवहार रूप में होते हुए भी उधार देने एवं
उधार लेने का ही संव्यवहार रहता है। भूमि का हस्तांतरण यद्यपि यह एक
विक्रय के रूप में है, वस्तुतः प्रतिभूति के रूप में अंतरण है।
(2) प्रतिक्रय की शर्त के साथ विक्रय में, संव्यवहार उधार देने या उधार लेने की
व्यवस्था नहीं है। यह एक हित का अंतरण नहीं है। यह सभी अधिकारों का
अंतरण है। यह प्रतिभूति के रूप में अंतरण नहीं है। यह केवल प्रतिक्रय के
वैयक्तिक अधिकार को आरक्षित रखते हुए, एक पूर्ण अंतरण है।
कोई संव्यवहार एक बंधक है इसका निर्धारण करने की कसौटी क्या है?
(1) कोई विशेष शब्द या हस्तांतरण का प्ररूप बंधक गठित करने के लिए
आवश्यक नहीं है। सामान्य नियम के रूप में, कुछेक अपवादों के अधीन
रहते हुए जहां संपदा का हस्तांतरण धन के लिए एक प्रतिभूति के रूप में
मूलतः आशयित है, वह एक बंधक है और जहां वह इस प्रकार मूलतः
आशयित नहीं है, वह बंधक नहीं है।
(2) यह पक्षों के द्वारा संविदा को दिया गया नाम नहीं है जो संव्यवहार को प्रकृति
को निर्धारित करता है। क्योंकि दस्तावेज विक्रय होना माना जा सकता है,
भले ही वह पक्षों द्वारा बंधक कहा जाए।
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- यह उसके द्वारा गठित एक विधिक संबंध है, जो यह निर्धारित करेगा कि
क्या संव्यवहार बंधक है या नहीं।
- पक्षों का आशय क्या था यह कैसे ज्ञात किया जाए?
यह ज्ञात करके कि उन्होंने उधार धन को किस प्रकार समझा है? यदि उन्होंने उसे एक ऋण के रूप में माना है, तब यह बंधक है।
न्यायालय द्वारा अपनाए गए मानदंड हैंः-
(i) ऋण का अस्तित्व।
(ii) प्रति संदाय की कालावधि, लघु कालावधि विक्रय की द्योतक होती है और दीर्घकालावधि बंधक की।
(iii) सकब्जा बंधक कर्त्ता की निरंतरता बंधक को इंगित करती है।