106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
इन मानदंडों को प्रयुक्त करने में, न्यायालय आरोप पक्ष पर भार रखते हैं कि दृश्यमान विक्रयपत्र बंधक था, पर भार रखते हैं, और संदिग्धता के अवसर पर बंधक की रचना की ओर आलम्ब होते हैं।
क्या आशय का मौखिक साक्ष्य स्वीकार्य है?
भारतीय साक्ष्य अधिनियम पारित होने से पूर्व, मौखिक साक्ष्य एवं अन्य विलेख इस आशय को प्रमाणित करने के लिए अबाध रूप से स्वीकार्य किए जाते थे, किन्तु यह कार्यप्रणाली प्रीवी काउंसिल द्वारा समाप्त कर दी गई।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम के पारित हो जाने के पश्चात् यह प्रश्न धारा 92 के द्वारा विनियमित होता है।
धारा 92, लिखित अभिलेखों का खंडन करने में, मौखिक साक्ष्य को अपवर्जित करती है। फिर भी भारतीय न्यायालय, लिंकन बनाम राइट (1859) 4 डीईजी.एवजे. 16 को प्राधिकारिता पर, पक्षों के आचार एवं व्यवहार के साक्ष्य को स्वीकार करते थे, यह दर्शाने के लिए कि एक विलेख जो एक पूर्ण अंतरण होने का आभास कराता था, बंधक के रूप में प्रवर्तित होना आशायित था।
1899 में, प्रीवी काउंसिल ने किशन बनाम लेगे = 22 इलाहाबाद 149 = 27 आई.ए. 58 में निर्णय किया कि लिंकन बनाम राइट विनिर्णय भारत में लागू नहीं होता।
परिणाम यह है कि, न्यायालय पक्षों के आशय को सुनिश्चित करने की खातिर निश्चित रूप से अभिलेखों तक ही सीमित हैं।
प्रश्न यह नहीं है कि पक्षों का अभिप्राय क्या था वरन् यह है कि उनके द्वारा प्रयुक्त शब्दों का अर्थ क्या है।
परन्तुक का महत्त्व
- शर्त उसी दस्तावेज में लेखाबद्ध।
ध्यान में रखे जाने वाले विचार बिन्दु।
केवल अर्थ है कि इस प्रश्न को तय करने में कि क्या शर्त अन्य विलेख में है, न्यायालय आशय का निर्धारण करने में विचार में नहीं ले सकता।
किन्तु, यदि वह उसी विलेख में अंकित था तो भी वह अनिवार्यतः सशर्त विक्रय द्वारा बंधक है और प्रतिक्रय की शर्त के साथ विक्रय नहीं है।
अर्थान्वयन का प्रश्न अब भी रहता है।
(III) भोगा बंधक
1. लक्षण
(i) कब्जे का परिदान या कब्जे का परिदान करने की वचनबद्धता।
(ii) बंधक-धन अदा होने तक ऐसे कब्जे को रोके रखने का प्राधिकार।