114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- मात्र निष्पादन पर्याप्त नहीं है। उसको तुरंत प्रभावी करने का आशय होना चाहिए।
परिदान का अभिप्राय है तुरंत प्रभावी करने का आशय। वह आशय परिदान या
अपरिदान की प्रक्रिया से स्वतंत्र है।
- जहां विलेख केवल एक या कुछ व्यक्तियों द्वारा निष्पादित होना आशयित है और
अन्य इसे पूरा करना अस्वीकार करते हैं वहां प्रश्न यह है कि क्या वह उन पर
बंधकारी है जिन्होंने इसको निष्पादित किया है, यह उन पक्षों का एक आशय है
जिसे हर एक के तथ्यों से प्राप्त करना होगा।
विलेख में सारभूत परिवर्तन - का प्रभाव
- विलेख में, बंधककर्त्ता की स्वीकृति के बिना और एक व्यक्ति जो उस (विलेख)
पर भरोसा करता है कि अभिस्वीकृति एवं संबंध के साथ, किया गया सारभूत
परिवर्तन, विलेख की प्रभावोत्पादकता को पूर्णतः विनष्ट कर देगा। 2. यदि केवल औपचारिक विषय-वस्तुओं से भरे जाने वाले रिक्त-स्थान छोड़े जाते
हैं, तो बंधकी अपने अधिकारों को जोखिम में डाले बिना उनको भर सकता है।
(1905) 2 सी.एच. 455 3. नियम के अभिप्राय में सारभूत परिवर्तन क्या है इस प्रश्न ने कुछ मत वैभिन्य
उद्भूत किया है।
10 सी.डब्ल्यू.एन. 788 (न्यायाधीश मुकर्जी जे.)
किसी लिखित में कोई परिवर्तन, जो उसे विधिक प्रभाव में भिन्न भाषा व्यक्त करने को प्रेरित करता है उससे जिसे वह मूलतः व्यक्त करता है, जो एक लिखित को या तो उसके पर्दों में या उसके पक्षों के संबंध में विधिक परिचय या लक्षण में परिवर्तन करता है, एक सारभूत परिवर्तन या तकनीकी रूप में परिवर्तन है, और ऐसा परिवर्तन लिखत को, परिवर्तन पर सम्मति न देने वाले सभी पक्षों के विरुद्ध अवधि मान्य कर देगा।
संविदा में किसी पक्ष की वृद्धि एक सारभूत परिवर्तन है।
तीन औपचारिकताओं का महत्त्व
- तीनों औपचारिकताओं में से किसी का अभाव संव्यवहार की वैधता के लिए घातक
है। शब्द है केवल।
- औपचारिकताएं न केवल विद्यमान हो वरन् वैध भी हों अर्थात् विधि के अनुसार
हों।
उस पर न केवल हस्ताक्षर हों वरन् हस्ताक्षर विधि मान्य हों।
न केवल अनुप्रमाणित होना चाहिए वरन् अनुप्रमाणन वैध भी होना चाहिए। यदि
अनुप्रमाणन अवैध है तो विलेख बंधक के रूप में प्रवर्तित नहीं हो सकता है -
अर्थात् निष्पादक की उपस्थिति या अभिस्वीकृति के बिना अनुप्रमाणन। 5. न केवल पंजीकरण हो वरन् पंजीकरण वैध हो।