बंधककर्त्ता के अधिकार - Page 140

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(iii) पुनर्हस्तांतरण प्राप्त करने का अधिकार।

मोचन का अधिकार

धारा 60

  1. मोचन का अधिकार बंधककर्त्ता को बंधकी से तीन बातों की अपेक्षा करने के लिए

हकदार बनाता है -

(i) बंधक-विलेख बंधककर्त्ता को परिदान करना।

(ii) यदि बंधकी का कब्जा है तो कब्जे का परिदान करना।

(iii) लिखित में अभिस्वीकृति कि अधिकार का मोचन लिया गया है, को

निष्पादित एवं पंजीकृत कराना।

  1. मोचन के अधिकार का प्रयोग वह निम्न शर्तों पर कर सकता हैः-

(i) बंधक-धन अदा करने पर या निविदत्त करने पर।

(ii) मूलधन देय को चुकने के पश्चात् किसी भी समय पर।

(iii) यदि मोचन का अधिकार पक्षों के कार्यों से या न्यायालय की डिक्री द्वारा

समाप्त नहीं किया जाता है।

(iv) यदि बंधककर्त्ता समग्र को मोचित करने को तैयार है।

(i) मोचन का अधिकारः-

  1. ‘प्रतिकूल संविदा के अभाव में’ जैसे शब्द धारा के शुरू में नहीं है।

  2. मोचन का अधिकार, इसलिए, एक सांविधिक अधिकार है जो किसी भी शर्त

द्वारा जो मोचन में बाधा डालती हो या निवारित करती हो सीमित नहीं किया

जा सकता।

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  1. मोचन पर अवरोध के होने के कारण ऐसी कोई भी शर्त शून्य है।

(ii). मोचन पर रोध-बंधक संव्यवहार में, बंधककर्त्ता के द्वारा मोचन को बाधित करने का, कोई भी प्रावधान शून्य है।

  1. रोध के विरुद्ध नियम में अंतर्हित सिद्धांत है कि बंधक एक ऋण चुकाने के

लिए एक प्रतिभूति के रूप में हस्तांतरण है। अपनी प्रतिभूति को वापस लेने

में व्यक्ति पर वर्जित भी निरोध न होना चाहिए।

  1. विक्रय एवं प्रतिभूति में अंतर है। यदि विक्रय है, संपत्ति को वापस लेने का

कोई अधिकार नहीं है। यदि प्रतिभूति है, संपत्ति को वापस लेने का अधिकार

है।

  1. यह अधिकार एक संविदा के द्वारा छीना नहीं जा सकता। यदि यह होता है,