भाग-2 बंधक के अधिकार एवं दायित्व - Page 141

124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

तो यह एक उपरोध माना जाएगा और प्रवर्तित नहीं किया जाएगा। (iii) मोचन पर उपरोध के उदाहरण

  1. निम्नलिखित खंड मोचन पर उपरोध हैंः-

(1) बंधककर्त्ता के जीवन काल में पुनः प्राप्त करना।

(2) उसके अपने धन से न कि किसी अन्य व्यक्ति के धन से पुनः प्राप्त करना।

(3) ऋणदेय पर अदा करके मोचन या बंधक विक्रय हो जाएगा।

(4) इस शर्त पर मोचन कि बंधककर्त्ता बंधकी को स्थायी पट्टठ्ठा देगा।

II. निम्नलिखित खंड मोचन पर उपरोध नहीं समझे जाएंगेः-

(1) तब तक मोचन नहीं कराना जब तक कि पूर्ववर्ती बंधकों को मोचन नहीं

हो जाता है।

(2) एक भाग बंधकी से 15 वर्ष व्यतीत होने के बाद तक मोचन नहीं

करना।

(3) मोचन के बाद कब्जा लेने के अधिकार का एक समुचित एवं आवश्यक

कालावधि के लिए स्थगन।

III. उपरोक्त क्या है एवं क्या नहीं, इस संबंध में कोई पक्का नियम नहींः-

(1) यह तथ्य मात्र कि बंधक के निबंधन कठोर है, खंड को उपरोध नहीं

बनाता है।

(2) कसौटी यह है कि क्या वह बंधककर्त्ता, मोचन के अधिकार को ऐसी

रीति से बाधा पहुंचाता है कि मोचन का अधिकार उसकी पहुंच के बाहर

हो जाए।

(3) यदि खंड उपरोध है, तब यह प्रवर्तित नहीं किया जाएगा, भले ही वह

सम्मति द्वारा डिक्री में हो। मोचन का अधिकार सम्मति देकर अधित्यक्त

कर दिया गया नहीं कहा जा सकता है।

(4) मोचन पर उपरोध का सिद्धांत केवल उन व्यवहारों के संबंध में है जो

बंधक के पक्षों के बीच उस समय, जब बंधक की संविदा कर ली गई

है, घटित होते हैं। यह एक-दूसरे के साथ बाद में की गई संविदा के

लिए प्रयुक्त नहीं होता है।

(1) उसका अभिप्राय है कि पक्षगण उस समय जब बंधक की संविदा

की जाती है, बंधककर्त्ता के मोचन करने के अधिकार को छीनने के लिए

स्वतंत्र नहीं है।

(2) किन्तु वे बाद में बंधक की संविदा की शर्तों में परिवर्तन करने के