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लिए स्वतंत्र है, आसैर कोई ख्ांड जो मोचन के अधिकारों को बंधित करता
है, उपरोध नहीं माना जाएगा।
V. देयः-
(1) संदेय से निश्चित रूप से प्रभेदित किया जाना चाहिए। धन संदेय हो सकता
है, किन्तु देय नहीं।
(2) देय = मांग-योग्य
(3) यदि वह देय दिनांक पर अदा नहीं किया जाता है, तो मोचन का अधिकार
लुप्त नहीं होता। बंधक-बंधक ही रहता है - केवल उसका प्रयोग किया
जा सकता है।
VI. संदाय
(i) यदि एक से अधिक बंधकी हैं तो संदाय सबको किया जाए।
(ii) संदाय का ढंग-विधिक-प्रस्तुति या ऋणदाता को स्वीकार्य कोई अन्य माध्यम।
(iii) संदाय का स्थान - (पाण्डुलिपि में पृष्ठ खाली छूटा - संपादक)
मोचन एवं विकास
धारा 63 (अ)
- मोचन पर बंधककर्त्ता प्रतिकूल संविदा के अभाव में, सुधारों के लिए हकदार
है।
- बंधककर्त्ता सुधारों के व्यय देने के लिए उत्तरदायी होगा, यदि सुधार-
(i) संपत्ति को विनाश से बचाने के लिए आवश्यक था।
(ii) प्रतिभूति को अपर्याप्त होने से रोकने के लिए आवश्यक था।
(iii) लोक प्राधिकारी के वैध आदेश के अनुपालन में किया गया था। 3. यह भी प्रतिकूल संविदा के अधीन है।
- धारा 63-अ सामान्य नियम निर्धारित करती है कि साधारणतः बंधकी सुधार
करने और बंधकी पर भार डालने को स्वतंत्र नहीं है। विधि का उद्देश्य धन
की एक बड़ी राशि को बनाने और उसके द्वारा उसके ऋण को उस सीमा
तक बढ़ाने से पुनः प्राप्ति करने की शक्ति का लुंज (अशक्त) करने का
जहां तक संबंध है से बंधकी को रोकना है। बंधकी को सुधारों के मोचन
को असंभव बनाने को अनुमत नहीं किया जा सकता है - यह बंधककर्त्ता
का अपनी संपदा में से सुधार करना कहलाता है।
- बंधककर्त्ता की सुधारों के लिए सम्मति मात्र उसको उत्तरदायी बनाने के लिए