130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
19 मद्रास 249 (252-53) पी.सी.
विक्रय एवं मोचन निषेध के अधिकार के प्रयोग के लिए शर्तें
- बंधक धन के देय हो जाने के बाद एवं मोचन की डिक्री बनाए जाने से पूर्व।
- वाद निश्चिततः संपूर्ण बंधक धन के लिए होना चाहिए। बंधक संपत्ति के एक
भाग के विक्रय या मोचन रोध के द्वारा बंधक धन के एक भाग की उपलब्धि के
लिए वाद नहीं हो सकता।
अपवाद
यदि बंधककर्त्ता की संपत्ति से बंधकों के हितों का पृथक्करण है तो बंधकों के द्व ारा एक भाग के लिए वाद लाया जा सकता है।
धारा 67 अ
- बंधकी जो उसी बंधककर्त्ता से बहुत से बंधकों को धारित करता है निश्चित ही
उन बंधकों पर वाद ला सकता है जिनके विषय में -
(i) उसे वाद लाने का अधकिर प्राप्त हो चुका है और
(ii) जिनके संबंध में उसे उसी प्रकार की डिक्री लेने का अधिकार है।
धारा 65 (अ)
- यदि बंधककर्त्ता न केवल संपत्ति की व्यवस्था कर सकता था वरन् यदि वह
विधिकतः बंधकित संपत्ति का कब्जाधारी है तो उसको उसके पट्टठ्ठे पर देने की
शक्ति होगी, जो बंधकी के लिए बाध्यकारी होंगे।
- बंधक के बाद संपत्ति के संबंध में बंधककर्त्ता की शक्ति सीमित है। वह सामान्य
प्राधिकार जैसा कुछ नहीं रखता।
- पट्टठ्ठा करने की शक्ति कुछ शर्तों से परिसीमित है।
(i) वह उसकी स्थानीय विधि, परम्परा या लोकाचार के अनुसार उसका पट्टठ्ठा
कर सकता है।
(ii) प्रत्येक पट्टठ्ठा सुरक्षित किया जाएगा जिससे किराया उपयुक्त ढंग से प्राप्त हो
सके - किराया अग्रिम अदा नहीं किया जाएगा।
(iii) पट्टठ्ठे में निश्चित रूप से नवीनीकरण की प्रसंविदा नहीं होनी चाहिए।
(iv) पट्टठ्ठा जिस दिनांक पर वह किया गया था, से 6 माह के बाद की दिनांक
से प्रभावी नहीं होगा।
(v) एक इमारत के पट्टठ्ठे की दशा में पट्टठ्ठे की समयावधि तीन वर्ष से अधिक
नहीं होगी।
- पट्टठ्ठे की सामान्य शक्ति प्रतिकूल संविदा के अधीन है। अन्य प्रावधान परिवर्तनों के
अधीन है।