बंधककर्त्ता का व्यवस्था करने का अधिकार - Page 150

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वह अपनी प्रतिभूति के प्रयोजनों के लिए नवीन पट्टठ्ठे के फायदे के लिए हकदार होगा।

यह इसके प्रतिकूल संविदा के अधीन है।

धारा 72

  1. संपत्ति का परिरक्षण करने का अधिकार

(1) बंधकी ऐसे धन को जैसा आवश्यक है व्यय कर सकता है।

(i) नाश या विक्रय से बंधक संपत्ति को परिरक्षित करने के लिए।

(ii) उस संपत्ति पर बंधककर्त्ता के हक के समर्थन के लिए।

(iii) उसमें स्वयं अपने हक को बंधककर्त्ता के विरुद्ध पक्का करने के लिए।

(iv) जबकि बंधकित संपत्ति पट्टठ्ठे के नवीकरण के लिए नवीकरण पट्टठ्ठाधारित हो।

(v) वह बीमा करा सकता है, यदि संपत्ति बीमा योग्य है और परिव्यय को मूलधन में जोड़ सकता है।

प्राथमिकता के लिए बंधक का अधिकार

(I) समय की प्राथमिकता

  1. स्थावर संपत्ति में हितों के अंतरण की दशा में प्राथमिकता के संबंध में सामान्य

नियम, संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 48 में निर्धारित हैं। 2. वही नियम बंधकों के प्रश्नों के संबंध में लागू होता है ताकि बंधकों की प्राथमिकता

उनके संरचना क्रम से दिनांकों पर निर्भर करती है और पूर्ववर्ती पश्चात्वर्ती पर

अभिभावी रहती है।

56 कलकत्ता 868 3. धारा 78 इस नियम का एक अपवाद है। यह निर्धारित करती है कि न्यायालय

पूर्ववर्ती बंधकों को परवर्ती बंधकों के लिए मुल्तवी करेगा जहां कि पूर्ववर्ती बंधकी

छलकपट, मिथ्या निरूपण या चोर उपेक्षा के द्वारा बाद के बंधकी को बंधक संपत्ति

पर प्रतिभूति पर उधार देने के लिए उत्प्रेरित करता है।

मिथ्या निरूपणः-

(1) (मिथ्या निरूपण) भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 18 में परिभाषित है।

(2) इसका अभिप्राय आवश्यकतः छलपूर्ण मिथ्या निरूपण नहीं है।

छल

घोर उपेक्षा

आंग्ल विधि और भारतीय विधि में एक अंतर है। आंग्लविधि के अनुसार घोर उपेक्षा का अभिप्राय उपेक्षा का छल के समान होना है।

भारतीय विधि के अनुसार घोर उपेक्षा छल से भिन्न है।