दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश XXVI आर. 1-10 के अंतर्गत एवं फौजदारी प्रक्रिया संहिता की धारा 503-508 के अंतर्गत नियुक्त आयुक्त (कमिश्नर) साक्ष्य लेने के लिए विधिकतः अधिकृत एक व्यक्ति है और इस प्रकार वह एक न्यायालय है।
5. न्यायाधीश
इस अधिनियम में शब्द फ्न्यायाधीशय् की परिभाषा नहीं दी गई है। सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 2(8) शब्द फ्न्यायाधीशय् एक सिविल न्यायालय के पीठासीन अधिकारी के रूप में परिभाषित करता है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 19 भी शब्द न्यायाधीश की परिभाषा करती है। इस परिभाषा के अनुसार एक न्यायाधीश, न्यायाधीश के रूप में निर्दिष्ट एक व्यक्ति है जो किसी (सिविल) या दंड विधिक कार्यवाही में निश्चायक निर्णय देने के लिए कानूनी रूप से समर्थ किया जाता है।
6. दंडाधिकारी
अधिनियम में इस शब्द की कोई परिभाषा नहीं दी गई है। सामान्य दंड अधिनियम (1897 का दशम) इस शब्द की निम्नलिखित परिभाषा निर्धारित करता हैः-
कुछ समय के लिए प्रवर्तित दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने वाला हर एक व्यक्ति मजिस्ट्रेट के अंतर्गत आएगा।
- इन परिभाषाओं में विलक्षणताएं हैं कि न तो वे एकरूप हैं और न वे सह विस्तृत
हैं।
(i) सिविल प्रक्रिया संहिता में न्यायाधीश की परिभाषा का आधार अधिकारी
की पीठासीनता है।
भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत उसी शब्द की परिभाषा का आधार उसके
निर्णय देने का अधिकार है। साक्ष्य के अंतर्गत परिभाषा का आधार साक्ष्य
लेने की शक्ति है।
(ii) दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत एक न्यायाधीश की परिभाषा में एक
मजिस्ट्रेट नहीं आता है। किन्तु भारतीय दंड संहिता की परिभाषा के आधार
पर एक मजिस्ट्रेट न्यायाधीश होगा।
(iii) साक्ष्य अधिनियम मध्यस्थ, चाहे न्यायाधीश हो या मजिस्ट्रेट हो को शामिल
नहीं करेगा। किन्तु भारतीय दण्ड संहिता में फ्न्यायाधीशय् की परिभाषा
न्यायाधीशों, मजिस्ट्रेटों, साथ ही साथ मध्यस्थों को शामिल करेगी।
सारांश है कि साक्ष्य अधिनियम में शब्द न्यायालय की परिभाषा केवल अधिनियम के प्रयोजन के लिए की गई है और यह उसके वैध क्षेत्र के परे तक विस्तृत नहीं होगी।
कार्यवाहियां जिनमें साक्ष्य अधिनियम लागू नहीं होता