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4. शपथ पत्र, न्यायालय के समक्ष न लिया गया और न प्रतिपरीक्षण किया गया

साक्ष्य है।

  1. शपथपत्र की सत्यता के लिए दो संरक्षण हैंः

(i) साक्षी को प्रति परीक्षण के जरिए प्रस्तुत किए जाने का प्रावधान।

(ii) झूठी गवाही देने पर दंडविधि का प्रावधान।

III. मध्यस्थ की कार्यवाहियां

वह काम चलाऊ और फौरन न्याय देता है और साक्ष्य विधि को तकनीकियों से बाध्य नहीं किया जा सकता है।

साक्ष्य अधिनियम के अध्ययन के लिए उपयुक्त पहुंच

  1. भारतीय साक्ष्य अधिनियम साक्ष्य की विषय-वस्तु को तीन भागों में विभाजित करता

हैः

प्रथम भाग तथ्यों की प्रासंगिकता से संबंधित है जिन्हें किया जा सकता है।

द्वितीय भाग प्रमाण से संबंधित है।

तृतीय भाग साक्ष्य के प्रभाव और प्रस्तुतीकरण से संबंधित है - प्रमाण का भार। 2. यह एक तार्किक क्रम हो सकता है। यह एक वैज्ञानिक क्रम हो सकता है। किन्तु

यह निश्चित रूप से एक स्वाभाविक क्रम वादकारी के दृष्टिकोणों से स्वाभाविक

होना प्रकट नहीं होता।

  1. प्रक्रिया के नियम मुकदमेबाजी के सामान्य व्यवहार को विनियमित करते हैं,

वकालत के नियम पक्षों और न्यायालय के मार्गदर्शन के लिए प्रत्येक मुकदमे में

भौतिक सारभूत तथ्यों को सुनिश्चित करने में, सहायता करते हैं। तब प्रमाण का

प्रश्न उठता है अर्थात् जो कि न्यायालय को संतुष्टि के लिए उपयुक्त विधिक

माध्यमों द्वारा विवादित तथ्यों का स्थापन करता है।

  1. प्रथम प्रश्न है, जिसका वादकारी सामना करता है कि किसको विधिक विषय सिद्ध

(प्रमाणित) करना चाहिए? तो प्रश्न कैसे और किस प्रकार के साक्ष्य द्वारा वह

उन्हें प्रमाणित कर सकता है, उसके लिए यह गौण प्रश्न है। अतः हमको ‘सबूत

का भार’ के साथ आरंभ करना चाहिए।