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एक विवाद्यक-विषय को प्रमाणित करना।
- एक विवाद्यक विषय की रचना करने में एक पक्ष के द्वारा तथ्यों एवं कथन प्रस्तुति की जाती है और विरोधी-पक्ष द्वारा उसको नकारा जाता है।
यहां दो तरीके हैं जिनके द्वारा विवाद्यक विषय निर्णीत किए जा सकते हैंः
(1) प्रमाणित करने के लिए आरोपित परिस्थितियां विद्यमान नहीं हैं या (2) प्रमाणित करने के लिए आरोपित परिस्थितियां विद्यमान हैं। प्रश्न है कि विवाद्यक विषय को सिद्ध करने के लिए दोनों विधाओं में से कौन सी को अपनाना है - स्वीकारात्मकता को सिद्ध करने की विधा या नकारात्मकता को सिद्ध करने की विधा।
- जहां धारण रोकने के कोई कारण नहीं हैंः
(अ) और जो दावाकृत है अधिक संभाव्य है, अस्वीकृति की तुलना में।
(ब) जहां सिद्ध करने के माध्यम (साधन) दोनों पक्षों को समानतः सुलभ हैं, तब नियम यह है कि यह पक्ष जो तथ्यों की विद्यमानता को आरोपित करता है अवश्य सिद्ध करे कि वो विद्यमान है। भार उस पर है जो प्रस्ताव को स्वीकारोक्ति में व्यक्त करता है। वह जो अस्वीकार करता है (नकारता है) उसे सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं कि वे विद्यमान नहीं है।
यह नियम धारा 101 में निर्धारित किया गया है।
- क्या कारण है कि नियम स्वीकारात्मकता सिद्ध करने की अपेक्षा करता है नकारात्मकता से नहीं।
(1) वह व्यक्ति जो एक अन्य को न्यायिक अधिकरण के समक्ष लाता है निश्चित रूप से अपने हक को साबित करने के प्रमाण की स्पष्टता पर विश्वास करे न कि अपने प्रतिवादी के अधिकार की कमी या प्रमाण की निर्बलता पर।
दृष्टांत
मिडलैंड रेल कं. बनाम ब्रॉम्बी - 17 सी.बी. 372
डोए बनाम लॉग्ड फील्ड - 16 एम एंड डब्ल्यू 497
17 सी.बी. 372/पृ. 380
(2) एक साधारण नकारोक्ति अपनी अनिश्चितता के कारण प्रमाण के लिए यदि असंभव नहीं है तो कठिन अवश्य है। एक व्यक्ति निश्चयपूर्वक कहता है कि कोई एक घटना घटित हुई, कब, कहां और किन परिस्थितियों में हुई। एक व्यक्ति कैसे असिद्ध कर सकता है और विश्वास दिला सकता है कि किसी समय नहीं, किसी स्थान पर नहीं और किन्हीं परिस्थितियों में नहीं, ऐसी एक घटना घटित हुई है। सर्वाधिक उदाहरणों में