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- साक्ष्य-विधि हालांकि दशाओं को निर्धारित करती है, जो एक विशेष तथ्य
का साक्ष्य दिए जाने से पूर्व अवश्य पूरी होनी चाहिए। इसी प्रकार साक्ष्य
विधि कुछ दशाओं को निर्धारित करती है, जो एक तथ्य को प्रमाणित करने
की विशेष विधा के एक विशेष तरीके के होने से पूर्व अवश्य पूरी हो जानी
चाहिए।
दृष्टांत - I
कोई बात साक्ष्य नहीं है जब तक कि वह न्यायालय के समक्ष उपस्थिति होकर नहीं दी जाती है। अतः साधारणतः एक व्यक्ति द्वारा किया गया कथन, जो मृतक है, साक्ष्य नहीं है। फिर भी साक्ष्य विधि एक मृत व्यक्ति द्वारा कही गई किसी बात को साक्ष्य दिए जाने को अनुमति देती है यदि वह विवाद्यक विषय के सुसंगत है इस दशा पर कि उसकी मृत्यु का तथ्य सिद्ध हो जाता है।
दृष्टांत - II
साक्ष्य-विधि उम्मीद करती है कि एक प्रलेख का सारांश मूलप्रति की प्रस्तुति के द्वारा अवश्य सिद्ध होना चाहिए। फिर भी विधि अमौलिक साक्ष्य का दिया जाना इस प्रतिबंधिता पर अनुमत करती है कि मौलिक प्रति की अप्राप्ति प्रमाणित है।
- प्रश्न है कौन, मृत्यु के तथ्य या मौलिक प्रलेखों को अप्राप्ति के तथ्य से प्रमाणित करे? धारा 104 उस पक्ष पर भार डालती है जो इन विशेष सुविधाओं द्वारा लाभ पाने की इच्छा करता है।
द्वितीय सिद्धांत की निर्देशी धाराएं
- धारा 106 एवं 111 द्वितीय सिद्धांत का निर्देशन करती है।
धारा 106
- यह धारा एक तथ्य के प्रमाण के भार के साथ विचार करती है, जो विशेषतः
पक्षा्रें में से एक पक्ष की जानकारी में है।
(i) यदि अ किसी तथ्य को आरोपित करता है और यदि ब उसको अस्वीकार
करता है तब धारा 103 में अंतर्विष्ट नियम की क्षमता से अ उसे अवश्य
प्रमाणित करे क्योंकि अ उसे निश्चयपूर्वक कहता है।
(ii) किन्तु यदि तथ्य विशेषतः ब की जानकारी में है तब इस धारा को क्षमता
से उसके संबंध में प्रमाण का भार ब पर आता है।
2. दृष्टांत
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