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वर्षों में जीवित था तब प्रमाण का भार उस पक्ष पर है जो दोष लगाता है कि वह जीवित था।
धारा 108 प्रमाण के भार के बारे में बताती है जहां प्रश्न है कि क्या वह पुरुष जिसके विषय में सुना नहीं गया है वह जीवित है या मृत।
धारा के अनुसारः
(1) यदि एक व्यक्ति के विषय में सात वर्षों से नहीं सुना गया है।
और
(2) उनके द्वारा जो प्रकृतया उसके विषय में सुन चुके होते हैं, प्रमाण का भार उस पर है जो पुष्टि करता है कि वह जीवित है।
टिप्पणी/समीक्षाः-
किसी पक्ष की मृत्यु, जिसे एक बार, जीवित बताया जाता है तो यह न्यायालय द्वारा निर्धारित किया जाने वाला एक मामला है। चूंकि धारणा जीवन की निरंतरता के पक्ष में है तो मृत्यु प्रमाणित करने का भार उस पक्ष पर है जो उसे निश्चयपूर्वक कहता है। परंतु जीवन की निरंतरता की धारणा उस समय से 7 वर्ष व्यतीत होने पर समाप्त हो जाती है जबकि प्रश्नाधीन व्यक्ति अंतिम बार सुना या देखा गया था। और प्रमाणित करने का भार उस व्यक्ति पर है जो निश्चयपूर्वक कहता है कि वह व्यक्ति सात वर्षों के अंतर्गत जीवित था।
किन्तु न्यायालय सात वर्षों से कम से कम समय में मृत्यु के तथ्य को पा सकता है,यदि अन्य परिस्थितियां अनुकूल या सहमत हों।
Re ः वाकर (1909) पृ. 115
धारा 107-108 की प्रयुक्ति
प्रश्न, जिसके लिए इन दो धाराओं में व्यवस्था की गई है वह है कि क्या एक व्यक्ति प्रश्न उठाए जाने के समय पर जीवित या मृत है। ये धाराएं वहां लागू नहीं होती हैं जहां प्रश्न है क्या वह पुरुष एक विशेष समय पर मर गया था। यदि कोई व्यक्ति मृत्यु का सही समय स्थापित करने की खोज करता है तो प्रमाण-भार उसी पर है।
धारा 109 - यह धारा प्रमाण-भार के साथ उसी तरह संबंधित है जिस तरह निरंतरता या अनिरंतरता के तीन संबंध हैं।
(1) भागीदार
(2) भूस्वामी और असामी
(3) प्रमुख और अभिकर्ता