158 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
यह धारा प्रावधान करती है कि एक बार यह दर्शाया जाता है कि दो व्यक्ति भागीदारों, भूस्वामी और आसामी या प्रमुख और अभिकर्ता के संबंध में रह चुके हैं और इसे सिद्ध (प्रमाणित) करने का भार उस पक्ष पर है जो आरोपित करता है कि वे उस संबंध में रहना समाप्त कर चुके हैं।
चतुर्थ सिद्धांत की निर्देशी धाराः-
धारा 1110ः- यह धारा संपत्ति के सत्वाधिकार के संबंध में, प्रमाण के भार के संबंध में है जब एक कब्जाधारी व्यक्ति और स्वामी (मालिक) जिसका कब्जा नहीं है के बीच विवाद है।
धारा 110 में निर्धारित नियम है कि इस प्रमाण का भार कि कब्जा रखनेवाला व्यक्ति स्वामी नहीं है, उस व्यक्ति पर है, जो आरोप लगाता है कि वह स्वामी नहीं है।
नियम के लिए कारण
स्वामित्व मुख्यतः वस्तु के एकांतिक कब्जे और उपभोग के अधिकार को द्योतित करता है। कब्जा रखने वाले को अन्य दूसरों को उसके उपभोग और कब्जे से अलग करने का अधिकार होता है, और यदि वह गलत तरीके से अपने अधिकार से वंचित किया जाता है, तो वह उसके कब्जे को पुनः प्राप्त करने के लिए अधिकृत होता है।
स्वामित्व, सम्पत्ति का निपटान, विक्रय, बंधक या दान करने की शक्ति को भी द्योतित करता है।
अतः कब्जे में रखने का अधिकार और उसका निपटान करने का अधिकार स्वामित्व के अनुषंगी हैं। जहां स्वामित्व है वहीं उसके साथ कब्जे का अधिकार और निपटान करने का अधिकार चलता है।
अतः कानून कहता है कि एक व्यक्ति संपत्ति पर कब्जा रखने वाला नहीं होगा जब तक कि वह उसका स्वामी नहीं हो जाता और उसके प्रतिपक्षी पर भार रखता है।
इस धारा का सिद्धांत निम्नलिखित मामलों में प्रयुक्त नहीं होताः-
(i) जहां कब्जा वास्तविक वर्तमान कब्जे से भिन्न मात्र न्यायिक है।
(ii) जहां कब्जा कपट या बल से प्राप्त किया गया है।
I. प्रमाण का भार
- विधि, उस व्यक्ति से प्रमाणित करने का भार, जो उस पर रखा जाता है, को
पूर्ण करने की अपेक्षा करता है।
- प्रमाणित करने के भार को संपन्न करने में दो विचार धारणाओं के प्रति
अवश्य ध्यान देना चाहिए।